रविवार, 7 फ़रवरी 2016

दरख़्त.....

सुनो....
 मुझमें....
 यादों का वो दरख़्त ...
 आज भी ज़िंदा है ......
 जो पत्ते तो बदल देता है .....
 पर ...मिटटी कभी नहीं बदलता  .....  
 तुमसे लिपटे हुए रहता है  ...
"हरा"हो या "पीला" ...
 तुम्हारा हर पत्ता ...
 पकडे हुए रहता है 
 मेरे यादों का ..
 दरख़्त ...
 ज़िंदा है ....

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

कनेर

"कनेर"  तुम मुझे इसलिए भी पसंद हो कि तुम गुलाब नहीं हो.... तुम्हारे पास वो अटकी हुई गुलमोहर की टूटी पंखुड़ी मैं हूँ... तुम्हें दूर ...