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मंगलवार, 1 मार्च 2016

मोती....

जीना चाहो मुझे .....तो क्या कुछ नहीं है मुझमें ....
अंतस में .......मोती ही मोती बिखरे पड़े हैं
थोडा चलना होगा तुम्हें  ......
मेरी  तरफ 
बिना शर्तों वाला .....
रास्ता पकड़ कर

और....
कहना भी होगा ......कि तुम्हें जीना चाहता हूँ
ये अंतस के मोती ........ दिखाना चाहता हूँ
जरा मुश्किल होगा .......
कोशिश करके देखो जरा ......
शायद हो जाये इस बार
नहीं तो......
किनारे के पत्थरों में बैठना
लहरों में बिम्ब ढूंढना
रेत पर नाम लिखना
टूटा शंख हथेली पर धरना .....आम हो चुका

उथले समुन्दर के किनारे ....
मेरे अंतस को .....छू नहीं पाएंगे
इक बून्द भी मुझे ....जी नहीं पाएंगे



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