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शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

दोहे....


सौ सौ नखरे ना दिखा कर ले झटपट काम
आज जरा कुछ सीख ले कल करना आराम
रिश्ता मेरी सोच का ,कागज़ को भी भाय
जब भी सुन्दर मैं लिखूं ,कलम यही इतराय
ऐसी बातें ना करो ,होता रहता काम
आज मिली कल ना मिले ,दोहों वाली शाम
हमें बड़ा फल चाहिए ,जैसे हो तरबूज
जब भी बदली सोच तो ,कहलाये खरबूज
घड़ा उठाकर मैं चली ,तू क्यूँ पीछे आय
नज़रें मुझपर गढ़ रही ,घड़ा मंद मुस्काय
सींचूँ सपना प्रीत का ,लिखकर सुन्दर गीत
कागज़ कलम दवात ला , ये मेरे भी मीत
सब को सब कुछ चाहिए ,ज़िद है या कि लगाव
राग द्वेष सब भर लिया ,दम्भ भरी ये नाव
धीरे धीरे अब भला ,कछु ना होता काज
सब्र पुराना हो गया , वक़्त नया सरताज
माली मेरा बांवरा ,कोशिश करता जाय
फलदायी या ठूंठ हूँ ,पानी देता जाय
हौले हौले रे मना तू भी तो कुछ बोल
ऐसा मौका ना मिले राज़ दिलों के खोल

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