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शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

ख़त .....





लिफ़ाफ़े में दिल बांधने का ... इक
हुनर सा है ख़त

बेहद इन्तेज़ारी को मिले जो ...बस
सबर सा है ख़त

शुरू से अंत तक "तुम" का ...ये
सफ़र सा है ख़त

मेरे लिए तो बस यादों की ...वो 
लहर सा है ख़त

लम्हा लम्हा कैसे बीता यही ...यही
कहर सा है ख़त

लफ़्ज़ों की धार बहती जाए ....ऐसी
डगर सा है ख़त

हरी हो रही ख्वाइशें आज मेरी ....क्या 
शज़र सा है ख़त ?

सूरज संग चांदनी डूबे ऐसी .... इक 
खबर सा है ख़त

 बेताबी बिन लिखे , पढ़ ले वो ...कैसी
 नज़र सा है ख़त ?

 टूटे- छूटे लफ़्ज़ों में भी गा जाएँ...लो
बहर सा है ख़त

शिकायत का पुलिंदा सा भी ....कभी
बशर सा है ख़त

कोई नहीं दरमियान , मशरूफ ....कोई
शहर सा है ख़त

कल्पना पाण्डेय 

5 टिप्‍पणियां:

  1. खत....."मेरे लिए तो बस यादों की ....वो लहर सा है खत
    बेहतरीन कल्पना जी...बहुत कुछ पुराना याद आ गया हम उस पीढ़ी के है जब माध्यम ही खत हुआ करते थे ...."लिफाफे मे दिल बांधनै का एक हुनर सा है खत ....शानदार ����

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  2. mere blog per aakar meri lekhni ko sarahne ka bahut bahut shukriya balkrishna ji......true fan u are

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  3. वाह बहुत सूंदर बहुत अंदर तक लगता है ये ख़त

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  4. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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