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बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

अधखिले फूलों की दर्दीली दुनिया .........

अधखिले फूलों की 
दर्दीली दुनिया 
सड़क पर पलते 
कई सारे छोटू 
और ढेर सारी मुनिया

आसमान और खिलौना 
एक सा लगता ,
देखते बस दूर से 
बस कोई छू नहीं सकता

खरोंच लगे या घाव गहरा 
अब फर्क नहीं पड़ता ,
मासूमियत नुच गयी है 
शरीर हो गया सस्ता

सूखी रोटी और जूठन 
अब और कुछ नहीं पचता ,
स्वाद और भूख का 
भला आपस में क्या रिश्ता ?

जन्मा सड़क पर 
कूड़े पर पला 
सड़क पर जी जाता ,
ये कैसा अजब फूल है 
जो सूखे दरख्तों पर भी 
पनप जाता ?

बेबस ,बेघर ,बेनाम बचपन 
बेहिसाब तरसता ,
जाले तक़दीर में हों तो 
रोशन जहां क्या मायने रखता ?

मासूम चेहरे ,थोड़े मटमैले 
दिल तो इंसानी ही धड़कता ,
फिर क्यों इंसानियत का ज़ोर
इनके लिए नहीं चलता ?

सड़क पर इन अधखिले 
फूलों को देख 
कल्पना का प्रश्न 
हर बार उठता ,
इन मायूस फूलों को 
बोने से पहले 
हे भगवान् 
तेरा दिल क्यों नहीं दहलता ?

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