रविवार, 7 फ़रवरी 2016

चाँद....

मुठ्ठी भर आकाश नहीं ,पूरा आसमान लूं
सूरज से उस की , उजाले वाली दुकान लूं
रात , लिखा करूँ , तारों पर अपनी दास्तान  इसलिए, चाँद से वो खाली खाली मकान लूं

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

हमेशा....

तुमने हर बार मुझे कम दिया और मैंने हर बार उससे भी कम तुमसे लिया। ना तुम कभी ख़ाली हुए .... ना मैं कभी पूरी हुई। हम यूँ ही बने रहें....हमेश...