शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

कलम...

कोरे कागज़ पर ....
लफ्ज़ बिन भी 
कुछ कह रही है ...कलम 
 कुछ ऐसे 
आज़ाद अंदाज़ में 
आज बह रही है ....कलम  

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मिलन......

भीग जाने के लिए मेरे पास पहाड़ बहुत थे ..... फिर तुम्हारी रेतीली आंखों से मिलना हुआ...