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शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

पुराना रिश्ता.......



आज कई सालों बाद ऐसा नज़ारा हमने साथ देखा
रुपहली धूप में असमानी पटल पर बादलों ने उकेरी हुई थी आड़ी-टेढ़ी रेखा
मेरी नज़र ने उन में उसका नाम लिखा पाया
उसकी नज़र ने मेरे नाम के साथ जुड़ा एक और नाम गिनाया
यूं ही पूछ बैठी ऐसा क्यों ?
प्राथमिकताए बदल गई हैं,कब तक कहाँ कुछ रहता ?ज्यों का त्यो


कोरे कागज़ पर यूं ही कुछ लिख कर देने का शुरू हुआ खेल
नियम वही पुराना ,उठती नज़र भी खानी चाहिए लिखे शब्दों से मेल
ये अंदाज़ आज का नहीं ,बरसों पुराना था
शायद ऐसे ही हमने एक दूसरे को जाना था
मेरे अलफाज सीधे दिल से निकलते हुए,बेखौफ से थे
उसके शब्द रुके -रुके ,सोचे समझे ,गैर से थे
यूं ही पूछ बैठी ऐसा क्यों ?
प्राथमिकताएं बदल गई हैं,कब तक कहाँ कुछ रहता ?ज्यों का त्यों


जाने पहचाने मगर अजनबी हो गए रिश्ते को उस पल जिंदगी मिल गयी ,
जब उसका हाथ थामते ही मेरी लकीरें उसकी लकीरों से जुड़ गयी ,
मेरे स्पर्श में मजबूत जकड़ थी ,उसकी सिहरन भरी पकड़ थी,
मेरे चहरे पर बेइंतेहा खुशी और सुकून था
उसके चेहरे में चमक थी पर और भी बहुत कुछ पाने का जुनून था
यूं ही पूछ बैठी ऐसा क्यों ?
प्राथमिकताएं बदल गई हैं,कब तक कहाँ कुछ रहता ज्यों का त्यो


मिले , बिछड़े, फिर मिले ,कहीं फिर न बिछड़ जाएँ ,
इस खयाल में डूबे डूबे दोनों ने बीते दिनों के किस्से सुनाये
मेरी हर बात पर घूम फिर के उसी का जिक्र था ,
वह तो अपनी ही दुनिया में गुम ,मेरी तरफ से बेफिक्र था
यूं ही पूछ बैठी ऐसा क्यों ?
प्राथमिकताएं बदल गई हैं,कब तक कहाँ कुछ रहता ?ज्यों का त्यो


आज फिर ख्यालों मे डूबी
बीती यादों को सहला रही थी
रह रह कर उसकी प्राथमिकता वाली बात याद आ रही थी
सोच रही थी,
बीतते दिनों के साथ फूल ही नहीं, रिश्ते भी ताज़गी खो देते हैं
बासी फूलों की भांति,ये रिश्ते भी भीनी महक खो देते हैं
मुरझाए फूल कुछ पल रुक कर ,पेड़ की ही जड़ पर फ़ना हो जाते हैं
ठीक वैसे ही ,
मुरझाए बीते रिश्ते भी पुरानी दबी यादों के ढेर मे समा जाते हैं

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