रविवार, 14 फ़रवरी 2016

खलिश.....

खलिश से , हम वास्ता नहीं रखते  
 वापसी का कोई , रास्ता नहीं रखते   

दिन रात , बस लकीरों में ढूंढते हैं  
हसरत , इस कदर बेसाख्ता नहीं रखते   

लहज़े सरकाते हैं , पत्थर दिलों से
फिर दीवारों से , राब्ता नहीं रखते 

दिल में , दबा लेते हैं अधूरी ख्वाइशें 
महफ़िल में , उन्हें नाचता नहीं रखते   

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तुमने हर बार मुझे कम दिया और मैंने हर बार उससे भी कम तुमसे लिया। ना तुम कभी ख़ाली हुए .... ना मैं कभी पूरी हुई। हम यूँ ही बने रहें....हमेश...