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शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

शब्दकोष में विदा और अलविदा......

अभी अभी पढ़ा शब्दकोष का सबसे रुआंसा शब्द होता है " विदा" | 
सच है , इक दूसरे से दूर जाने का डर आँखों से जब मोती बन कर बहता है , वो लम्हा हर उस दिल को मोम कर देता है जो रिश्तों में गुंथा हो |
"विदा"  शब्द वैसे खुद तो इतना रीता रीता लगता है पर अपने पीछे इक लम्बी डोर छोड़ जाता है | यादों ,एहसासों ,जरूरतों की डोर | इस डोर में रिश्ते उलझ कर लोटते रहते हैं , हर लम्हा हर पल | 
हर बार रिश्तों का मांझा उलझता चला जाता है | फिर ये दर्द ,तन्हाई , विरह जैसी गाँठ बनने लगता है | रोज़ इक नयी गांठ से डोर छोटी होती जाती है और जाने वाला करीब और करीब आता जाता है | "विदा" अगर कुछ लम्हों की है तो बेशक लौट के आती है , इस गांठों वाली डोर को पकडे पकडे | 
पर ....
ये "विदा" अगर हमसे अलहदा होकर गयी तो "अलविदा" हो जाती है | 
फिर वापसी की कोई डोर साथ नहीं रखती | डोर लपेट कर रख देती है |आते आते अपने पैरों के निशा पोंछते हुए आती है  |

असल में रुआंसा से भी बढ़कर रुआंसा शब्द रिश्तों में " अलविदा "है | इसके झरे मोती आँखों से गिर कर बस जमते जाते हैं दिल पर | आँखों में रोज़ वही इक शून्य रख जाते हैं |
बिलकुल रीता समुन्द्र , बिलकुल खाली आकाश जहाँ से न वापसी वाली डोर होती है , न ही कोई लौट आने की आहट ही  |

फिर शब्दकोष में ज़िन्दगी उस रिश्ते को तलाशती रहती है हर शब्द में , हर अर्थ में ....रूआंसा होकर भी |



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