सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

मुकम्मल ख्वाइशें.....

तमाम दिन का सफ़र करके
रोज़ रात ये "ख्वाइशें"
इस उम्मीद के साथ 
मेरी "कोशिशों "के साथ
सो जाती हैं ,
की कल का "सूरज "
उन्हें मुकम्मल मुकाम तक
पहुँचाने वाला है
और .......
हैरत इस बात की है कि
जितनी ख्वाइशें बढ़ती हैं ,
कोशिशें उतना ही
मखमली बिस्तर
उनके लिए बिछाती हैं
और सूरज सजा धजा
तैयार खड़ा रहता है
मेरी मुकम्मल ख्वाइशों की
रोशनाई अपने पर मलने को
"अब तो मुस्कुरा कल्पना ".....कहने को

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पूर्ण विराम

रुकने के लिए मेरे पास पूर्ण विराम भी था पर तुम ज्यादा पूर्ण थे....मेरे विराम के लिए।