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सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

नारी हूँ मैं .......

नारी हूँ मैं ,
ये न समझ 
की एक बुत हूँ 

तेरा हर दर्द धारण करती हूँ मैं 
तेरा साथ आमरण देती हूँ मैं 
कल्पना से परे हूँ ,
क्योंकि नारी हूँ मैं

तेरा हर व्यवहार सह जाती हूँ मैं 
तेरे अहम् में कई बार ढह जाती हूँ मैं 
सहन शक्ति से परे हूँ ,
क्योंकि नारी हूँ मैं

तेरे जीवन की लौ जलाती हूँ मैं 
तेरे सपनों को हाथों से सजाती हूँ मैं 
क्षमता से परे हूँ ,
क्योंकि नारी हूँ मैं 

तेरी खुशियों को दामन में संजोती हूँ मैं 
तेरी कमियों को आंसुओं में धोती हूँ मैं 
आशा से परे हूँ 
क्योंकि नारी हूँ मैं

अब इतना न खेलो मेरी आत्मा से 
की प्रश्न पूछना पड़े ये खुद से 
की क्या मैं बुत हूँ ?
या नारी हूँ मैं ?
या बुत बन गयी नारी हूँ मैं ?

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