गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

खूबियां...और खामियां....

ठीक तुम्हारे पीछे ....
  मैं खड़ी हूँ......
  खूबियों ...और
  खामियों .....
  की फेहरिश्त सी

  अबकी  .....
  नज़र ....और
   नज़रिये ....
   का चश्मा बदलते रहना ....
   सिर्फ ....
    दूर ....और
    पास ....का  नहीं ....
    उस ग्लास .... और
    इस फ्रेम का नहीं

ड्राइविंग

कैसे समझाऊं .....कब समझोगे ?
कि "तुम"..... "मोड़" नहीं हो मेरे लिए
  तुम "पड़ाव" हो
  मेरा ठहराव हो 
  उस "डगर" पर
जो "आती - जाती "नहीं ....
सिर्फ जाकर थम जाती है
वही कहीं रम जाती है

कभी आना चाहो मुझ तलक
  तो..... इसी "रस्ते "आना
  और सुनो ! "हम" नाम की "तख़्ती" ढूंढना
  जल्दी पहुंचोगे
  बिना बूझे
इक बात और ..... मेरी तरह "सुकून" से आना
जानते तो हो ....
मुझे "शॉर्टकट्स".....
और......"रैश ड्राइविंग"से कितनी चिढ है

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

वक़्त नहीं .....


ये यादों के उजाले 
जाने कौन सी उम्मीद लिए 
मेरा दर खटखटा रहे हैं ?
 
जानते है .....
कि मुझमें छाया हुआ है 
"कोहरा"
मसरूफियत का  ,
भागती दौड़ती 
ज़िन्दगी का 

वक़्त ही नहीं ,
कि मैं 
वो अपनापन दे सकूँ 
वही पुराना ,
दीवानापन दे सकूँ 

वजह भी नहीं ,
अब जगह भी नहीं ,
तितलियों सी यादों को 
सजाने के लिए,
सिरहाने में 
बसाने के लिए,
फिर किस्मत 
आज़माने के लिए ,
एक बार फिर 
दूर जाने के लिए







कल्पना पाण्डेय

नया साल ....

ये क्या ? 
तुम फिर मुंह लटका कर खड़े हो गए 
और ये .....टसुए क्यों बहा रहे हो ?
"जा रही हो "....."जा रही हो" ...
क्यूँ  चिल्ला रहे हो ?
नए साल को अगर .....
ख्वाब ....ख्वाइशें ...उमींद दे रही हूँ
 तो जाते जाते ....
तुम्हें भी तो यादों ....तजुर्बों  का 
तोहफा दिया है 

 क्या बच्चों की तरह .....
मेरा पल्लू खींच रहे हो 
मेरी उँगलियों को ....
हथेलियों में भींच रहे हो 
जाने दो मुझे .....
साल भर के ....."इश्क "का ही तो ...
"वादा" था तुमसे 
 ऐसी ही तो हूँ "मैं" ......जानते तो हो !
तुमसे पहले भी .....कितने सालों का 
मलबा रखा हुआ है अंतर्मन में
सब में ....खुद को ...
थोडा थोडा रखा हुआ है मन में
तुम भी रख लो .....थोडा सा मुझे 
और .....विदा दो 

देखो ....
नया साल ....
कितना "रूमानी "दिख रहा है 
भरोसा है मुझे .....
"साल भर का ये इश्क" भी ......
"मुकम्मल "रहेगा मेरा 

कल्पना पाण्डेय

रुका हुआ समुंदर ......

कभी सोचती हूँ .....
"ज़िन्दगी "......रुके समुंदर सी होती !
कितना अच्छा होता ....
 बिना लहरों वाला समुंदर 
इक सरीखा सा  ......
न उतार ......
न चढ़ाव ....
 बस ........जिये जाओ 
गिन गिन साँसे .....लिए जाओ

फिर सोचती हूँ तब .....
दो कदम .....आगे चलकर 
दो कदम पीछे गिरने का मज़ा कैसे लेती ?
 दो कदम .....पीछे से 
इक फर्लांग की कूद कैसे लगाती  ?
दो चार .....साँसे फ़ालतू कैसे लेती ?
ना .....ना.....
लहरों वाला समुंदर ही ठीक है 
ये लहरें .....
मुझे ज़िंदा रखे हुए हैं

रुका हुआ समुंदर ......
ज़िन्दगी के बाद देख लेंगे 
वो तो ....वही खड़ा रहेगा 
मेरे जीकर आने तक


सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

दो आखर की "कविता "....

दो आखर की "कविता".... देखना चाहो.....
तो ये लो ...."आइना "
पर....
इक गुज़ारिश है .....
कुछ पल ...."नैन" मेरे धर लो

दो आखर की "कविता " से हो ......"तुम"
"मैं" नहीं.....
मेरी "कलम " कहती है ......

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

इज़हार......

चाँद तुम भी न ......
बिलकुल 
"जीरो बट्टा निल"  लगते हो 
इश्क के मामले में 
अलग अलग भेस धर के 
क्या सोचते हो 
मुझे ठग लोगे तुम ?
रात की काली चदरिया ओढ़ लो 
या तारों वाली अचकन पहन लो 
 अपना स्पर्श कैसे बदल लोगे तुम ?
जान छिड़कती है चांदनी मुझ पर
 राहों में उसकी कैसे दखल दोगे तुम ?

लाख छिपाना चाहो ये पैगाम 
जो तुम मेरे लिए दिन भर 
छिप छिप कर लिखते हो 
सूरज की नज़र से 
बचा बचा कर रखते हो 
 दे क्यों नहीं देते  ?
कह क्यों नहीं देते  ?
कब उस जीने से 
 उतर कर नीचे 
मेरे करीब आओगे तुम ?
तुम्हारा हूँ .....कहोगे तुम
तुम्हारे  लिये 
रात भर चला हूँ ......कहोगे तुम
कह दो न आज ......
आज तो .....बस कह ही दो
या 
उम्र भर मेरे लिए 
यूँ ही "जीरो बट्टा निल" ही रहोगे ?
बस गोल गोल ....चाँद जैसे  
मेरे लिए ...... चमकते शून्य जैसे



  

उदासी .....

जब भी मन उदास होता है 
तुम झर र 
गिरने लगते हो आस पास 
निश्छल भावनाएं 
अंजुरी में भर कर  
मंद मंद मुस्कुराते हुए 
ऐसे चले आते हो मुझ तक 
की लगता है 
इक सरिता बह रही है 
हमारे बीच 
और मैं न चाहते हुए भी 
चल देती हूँ 
तुम्हारी ठानी हुई दिशा की और 
निशब्द सी 
ऐसे की जैसे 
मैं थी ही नहीं कभी 
मेरी उदासी भी 
उदास रहती है मुझसे 
क्यूँ की 
हर बार बह जाती है 
तुम्हारे नेह से 
तुम्हारे स्पर्श से   


एहमियत.....

फासलों में ...... एहमियत सी
नज़दीकियों में  ......जरुरत सी
नजर आती हूँ मैं
ऐ ज़िन्दगी ......
बहुत सही जा रही है तू   

सुन हवा ....

सुन हवा !
ओह बरसाती हवा  ! 
 तेरी हर साजिश 
मुझे भिगाने की 
संग उड़ाने की
मुझे मिटाने की 
मुझे तरबतर कर देने की  
क़ुबूल है मुझे 
क्यूंकि तू 
उनसे रूबरू हो कर आयी है 
उनकी खुश्बू संग लायी है 
तेरे हर जर्रे में 
उनका एहसास सुनाई देता हैं 
उनका अक्स दिखाई देता है  
मुझे उन तक पहुँचाने की 
तेरी हर कोशिश 
हर साजिश 
मुझे क़ुबूल है  

मेरी डायरी .....

कल रात 
डायरी के पन्ने खुले रह गए 
उठा कर देखा , 
तो रचनाएँ 
आधी अधूरी दिखी 
कुछ शब्द लापता थे 
 हैरत में थी ......
लगा , कुछ हलचल थी आस पास 
देखा तो पाया ......शब्द नाच रहे थे 
 फिर जाने क्या हुआ 
दो शब्द..... "मैं" और "तुम" टकरा गए 
 देखते ही एक दूसरे को भा गए 
 तुम ..... मैं को 
शब्दों की भीड़ से खींच लाया 
दोनों इक दूसरे में समां गए 

इतने में "प्रेम" दबे पाँव आया 
और उनसे लिपट गया 
तपिश महसूस हुई 
मैं और तुम पिघल गए 
"हम" हो गए  

अद्भुत मंजर देखने 
खूबसूरती ..... लगन 
निष्ठा ..... प्रणय 
नेह ..... ख्वाइश 
ख्वाब ..... चाहत 
ज़िन्दगी ..... खुश्बू 
सुकून ..... ख़ुशी 
एहसास ..... एहमियत
रिश्ता ..... स्पर्श 
 और भी न जाने 
कितने शब्द चले आये 
"हम" के इर्द गिर्द 
बस ख़ुशी से झूमने लगे 

 नाच नाच के 
 थक हार के ,
 सारे शब्द वापस चले आये 
 सो गए शायद 
 इक बार फिर
 मेरी डायरी खूबसूरत नज़र आयी  
बस ऐसे ही 
कलम से "कल्पना" उभर आयी |

कल्पना पाण्डेय 

बादशाहत....

रिश्ते में ता उम्र हमारी बादशाहत रहेगी
गर "मैं" और "तुम" की नज़र "हम "पर रहेगी

बचपन......

आओ ....
बचपन में गोता लगा आएं
माँ के आँचल में ....
चाँद सोया है 
चलो ...
उठा लाएं  

कितना कुछ रह गया है ....करने को  
कितना कुछ अभी बाकी है 
मुद्दत हो गयी संग खेले हुए 
जाने कब से ना गप्पें हाँकी है 

ये भी कर लूं ....
वो भी कर लूं ......
दो पल रुक तो ज़िन्दगी 
पीछे मुड तो ज़िन्दगी
 कितना कुछ रह गया है ......करने को  
 कितना कुछ अभी बाकी है 

 परी और .....चाँद की झड़प 
 तितली को ....छूने की तड़प
 अमिया का पेड़... दो चार लपक 
 कागज़ की किश्ती .....पानी में छपक 
 गेंद और गिल्ली .....बल्ले की धमक 
 गुड्डे की गुड़िया संग ....ब्याह की ललक                  तोतले बोल .....नाच और ठुमक
भरी दोपहरी .....खेलने की सनक 
खिलौनों की और .....कंचों की कसक 
दोस्तों और ......पतंगों की फड़क
माँ की गारियां...बाबा की हुड़क  

 कितना कुछ रह गया है करने को  ......
 कितना कुछ अभी बाकी है 
 दो पल रुक ज़िन्दगी 
 पीछे मुड चल ज़िन्दगी 

आओ ....
बचपन में गोता लगा आएं
माँ के आँचल में ....
चाँद सोया है 
चलो ...
उठा लाएं  

कल्पना पाण्डेय 

खलिश.....

खलिश से , हम वास्ता नहीं रखते  
 वापसी का कोई , रास्ता नहीं रखते   

दिन रात , बस लकीरों में ढूंढते हैं  
हसरत , इस कदर बेसाख्ता नहीं रखते   

लहज़े सरकाते हैं , पत्थर दिलों से
फिर दीवारों से , राब्ता नहीं रखते 

दिल में , दबा लेते हैं अधूरी ख्वाइशें 
महफ़िल में , उन्हें नाचता नहीं रखते   

रूबरू....

ऐ समुंदर .......

बेशुमार अपनी लहरों का गुमान न रख
बेहिसाब अदाओं से रूबरू हुआ 
जो इक बार उसकी
खामोखां ......
पानी पानी हो जाएगा

मेरा फख्र ....

गर आंसुओं में आवाज़ हुआ करती 
 या उस अर्ज़ में परवाज़ हुआ करती 
तो मेरा फख्र ....
इस मौसम
यूँ ही नहीं सूखता  
उस मौसम
यूँ ही नहीं भीगता

दिन....

आज का दिन ढला नहीं....
 किसी ने कुछ कहा नहीं ......
 किसी से कुछ सुना नहीं.....

तलाश .....

तलाश .....
सिर्फ , सुकून की होती 
 नाम ......
रिश्ते को , मिले , ना मिले  
पहचान......
रूह को , रूह देगी
आश्ना ......
दिल को , मिले , ना मिले   

आज बस और बस.....

ऊब गयी हैं खामोशियाँ भी ....
कहने लगी हैं खामोशियाँ भी....
फेर दो.....
 कुछ मुट्ठी भर .....शब्द मुझ पर 
उकता गयी हूँ ...
सन्नाटे की चादर में लिपटकर  
इस चुप सी कालीन पर चल कर 
 मूक हुआ है रिश्ता......
सुर दो.....शब्दों के 
गुर दो ......लफ़्ज़ों के 
पिघलने दो ....
ये जमे से .....लफ्ज़ दरमियाँ
ये थमे से .....लफ्ज़ दरमियाँ
 चुभने दो 
कुछ एहसास की किर्चियाँ अब
ये आभास की किर्चियाँ अब

 थक गयी हूँ ......
तन्हाई की चौसर पर ....बैठे बैठे 
कुछ भी ना ..........सुनते कहते
बस लफ्ज़ ही वारो मुझ पर
आज बस और बस.....
शब्द ही हारो मुझ पर

वो खत .....

खत तो ....
कब का पढ़के रख दिया है 
किताबों के बीच कहीं .....
बस ....
कुछ एहसास ....
कुछ लफ़्ज़ .....
भूले बिसरे 
चले आते है जहन तक 
रोज़ .....इक नयी सरसराहट लिए हुए 
हुबहु ......तेरी वाली आहट लिए हुए 

और ....
वो खत .....
किताब के महकते हर्फ़ से 
रोज़ ही लिपटता है
कहता जाता है......
अपनी रूह की  
अंतर्मन की

शब्द.....और प्रेम

हर बार ......
सिर्फ शब्द ही तो होते हैं..... हमारे सेतु
बस.... गिने चुने
सीमायें ओढ़े 
और इक ....आहट धुंधली धुँधली
हाँ .....और........ ना के बीच डोलती
वो कुछ जो लिखा ही न गया हो अब तलक
वो कुछ जो कहा ही न गया हो अब तलक
पर उभर रहा है इस तरफ भी
और .....शायद उस तरफ भी
अदृश्य  .....
अपार .....
अनंत .....
इस छोर से .....उस सिरे को
महसूस होता हुआ
महफ़ूज़ होता हुआ
कुछ ....पनप रहा है शायद
या ...
चुका है .....
और .....
वाला है .....
के बीच दिख रहा है शायद
मुस्कुराता हुआ .....

  अब की मिलोगे तो .....पूछूंगी कि ....
  हम तो शब्द बोते हैं तो ......
  ये प्रेम कैसे फ़ूट रहा है ?

इश्क़.....

जो बूँद .....सागर लगे
और ......
जो सागर .....बूँद
बस ....
वही इश्क़ है

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

मछलियां.......



दिल ग़मों से इतना लबालब है
ख्वाइशों की मछलियां भी अब उड़ना चाहती हैं

इल्तज़ा......



बेशक तू ले आजमाईशें मेरी
भूलने न पाऊँ मैं नेमतें तेरी
इल्तज़ा इतनी सी है खुदाया मेरे
उभरें न हौंसले में दरारें मेरी

माँ की व्यथा ...... बिटिया का कथन......


माँ की व्यथा .......
हैवानी समुंदर में , अपना मोती कैसे बचाऊँ
बिटिया की माँ हूँ ,सोच के ही , सिहर जाऊं
खुबसूरत है ये दुनिया , बतला तो रही हूँ
घिनौना आस पास देखूं , खुद बिखर जाऊं
कब तलक बंधी बंधी रखूं ये नन्ही चिड़िया
ममता के मारे , कहीं पंख ही न क़तर जाऊं
अल्हड लहर, उफनती ख्वाइशों सी है वो
फख्र करूँ ,की फ़िक्र , मैं किस डगर जाऊं ?
बिटिया का कथन......
कितना न्यून हुआ है वजूद मेरा
वक़्त नहीं , ज़माना कहे की घर जाऊं
अँधेरा तो फिर भी नोच लूँ अपना
अंधेर हो जाये ,तो बता किधर जाऊं ?
फिक्रमंद हैं , परियां भी अर्श की
भूल से ऐसे फर्श पर न उतर जाऊं
मुदत्तों से , इक फरक दिखा है मुझको
गिला इक यही लिए , खुदा के नगर जाऊं

सफ़र .....


आज फिर
उन आँखों की हसरतें
मुझ तक 
रफ्ता रफ्ता पहुँची
और
क़तरा क़तरा
पिघळ गयी
मुझ तक
पहुँचने से पहले
गीली गीली
रुक गयी
मेरी आँखों में
सूख गयी ---
मोम सी
उसकी
ख्वाइश
उसकी आँखों से
मेरी आँखों
के "सफ़र "में
जली
पिघली
सिमटी
आज फिर
राख हुई
ख्वाइश

आखरी फरमाइश.....


या खुदा ......
अब कुछ पल
मुझे ऐसी जगह ले चल 
जहाँ मैं और सिर्फ मेरी परछाई हो
अब मुझे वो ज़मी बक्श
जहाँ ना मेरी जान पे बन आयी हो
भूल जाने दे वो जन्म मेरा
जो मैं जी के आयी हूँ
स्त्री होने का जहर
जो मैं कुछ देर पहले
पी के आयी हूँ
अभी अभी ....
"मैं "और .....मेरे अपने
अपने और ......सपने
सपने और .....हकीकत
हकीकत और ......सोच
सोच और .......रिवाज़
रिवाज़ और .....रवायतें
रवायतें और .....दर्द
दर्द और ......फिर वही "मैं "
ये "परिधि "
पूरी करके आयी हूँ
बेहद टूट कर आयी हूँ
क़तरा क़तरा नुच के आयी हूँ
दवा नहीं है मेरे जख्मों की
मुझ पर तू दुआ रख दे
मेरा वजूद कोई छू न सके
अगले जनम में वो हक़ दे
अब मुझे बस सो जाने दे
अपनी पनाहों में खो जाने दे
जागी हूँ उम्र भर इस चैन के लिए
किसी दूसरी दुनिया का हो जाने दे

रिश्तों के बादशाह....

गर "तुम"को "मैं" की फ़िक्र हो जाये 
बस "मैं" को "तुम" पर फक्र हो जाये
खुदा कसम ....."हम"
रिश्तों के बादशाह हो जाएँ

,एहसास सस्ते नहीं.....

परदेश के पंछी बसा तो लिए
चुगते संग हैं ,चहकते नहीं
शिकन हो या जलन दूजे से
कूड़ा है ,हम रखते नहीं
राज़ दार हैं तन्हाइयों के
गम सोखते हैं ,ढंकते नहीं
दिल पलट देते हैं हम आजकल
ताज़ो - तख़्त अब दीखते नहीं
शिकवा बेरुखी का हमीं से क्यूँ
आप भी तो मुझ पर मरते नहीं
उम्मीद की डोर बंधी है पतंग
कट जाये ,फिकरे कसते नहीं
चुन चुन के लफ्ज़ पिरोते हैं
अनमोल हैं ,एहसास सस्ते नहीं

पहाड़ी आसमान में उड़ते दो बादल


पहाड़ी आसमान में उड़ते दो बादलों में
एक पहाड़ी ,एक विदेशी सा लगता है
दोनो को जुड़ा हुआ देख ,
पुराना याराना सा लगता है
मुस्कुराता हुआ बादलों का जोड़ा ,
पहाड़ी सुन्दरता को निहारता सा लगता है
उनकी आँखों से ये नज़ारा,
कुछ इस तरह सा लगता है
पहाड़ की फिजा में पुराना कोई गीत गूंजता सा लगता है
सब कुछ यहाँ धुला धुला,स्वच्छ , उजला-उजला सा लगता है
शहर की उलझनों से दूर ,थमा सा ,सांस लेता हुआ सा लगता है
दो पल रुक ,दूसरों की नयी -ताज़ी सुनता सुनाता सा लगता है
बदलते वक़्त के साथ ,किसी भी दम पर खुद न बदलता हुआ सा लगता है
पहाड़ से जुड़ा पहाड़ी कहलाने का गौरव प्राप्त करता सा लगता है
खुद जियो ,दूसरों को जीने दो का अर्थ सार्थक करता सा लगता है
मौसम भी यहाँ पल-पल आँख मिचौली खेलता सा लगता है
हर खिलता फूल आने वाले का स्वागत करता सा लगता है
फलों से लदा पेड तेरे सम्मान में सर झुकाया सा लगता है
कहीं कोयल, कहीं कोई पंछी का स्वर, हमारा हाल पूछता सा लगता है
रात को चमकता जुगनू ,अँधेरे में राह दिखता सा लगता है
भोर होते ही सूरज, मेरे द्वार पर पहली दस्तक देता सा लगता है
मंद मंद बहता हवा का झोंका, मेरे लिए, सिर्फ मेरे लिए बहता सा लगता है
पहाड़ के उस ओर बना घर रंगीन माचिस की डिबिया सा लगता है
दूर पहाड़ पर खड़ा देवदार का वृक्ष अपना परचम लहराता सा लगता है
ऊंची नीची सड़कों में जन और जीवन बंधा सा लगता
ऊँचाइयों पर बसा मेरा घर और उन्नत होने का आशीर्वाद सा देता लगता है
ऊंचा नीचा रास्ता हर दिन स्थिरता का इम्तेहान लेता सा लगता है
बड़ी सी नथ ,पिछोड़ा ओढे युवती का रूप यहाँ की संस्कृति का प्रचार करता सा लगता है
माथे पर पिठिया ,सर पर टोपी ,दाज्यू कहता हुआ युवक ठेट पहाड़ी सा लगता है
पहाड़ी आसमान से ऐसा नज़ारा देख कर बादलों को वक़्त का पता सा नहीं लगता है
चाह कर भी वक़्त रुकता नहीं ,छुट्टियाँ ख़त्म होने में समय कहाँ लगता है?
अनमना सा विदेशी बादल चुपचाप सामान बाँधता सा लगता है
नौकरी और रोटी की उलझन में शहर की तरफ खिंचता सा लगता है
जाऊं, न जाऊं? सोचकर विचलित सा ,त्रिशंकु की तरह लटका सा लगता है
पहाड़ी बादल हाथ पकड़कर दाल रोटी खा यहीं रुकने की प्रार्थना सा करता लगता है
पर विदेशी बादल जरूरत से लम्बी अपनी जरूरतों की गिनती गिनाता सा लगता है
भारी मन से आंसुओं की सौगात के साथ विदा लेता सा लगता है
जल्द से जल्द पहाड़ लौट आने का वादा देता सा लगता है
हाय !बेचारा कर्मभूमि के लिए ,जन्मभूमि को छोडता सा लगता है
विदेशी बादल आज पहाड़ से मैदान में उतरता सा लगता है
पीछे मुड़ -मुड़ कर पहाड़ी हर चीज़ को आँखों में समेटता सा लगता है
हरा -भरा उन्नत होते हुए भी अपनी जड़ों से कटा-कटा सा व्यथित लगता है
जल्द ही यहीं लौट कर बसने का प्रण अपने आप से करता सा लगता है
नीचे आता विदेशी बादल अपने भाग्य का कोसता सा लगता है
पहाड़ी बादल को दूर तक हाथ उठा-उठा शत-शत नमन सा करता है
इतने सालों बाद ,
आज भी आसमान में लटका पहाड़ी बादल ,मिटटी से जुड़ा ,बेहद संतुष्ट सा लगता है
पहाड़ी आसमान में नहीं,पूरी कायनात में उसका वजूद कायम सा लगता है
नित नए विदेशी बादलों की सोच बदलने के लिए ,वह सदा ही प्रयत्न्मान सा लगता है
आज भी वह बूढ़ा पहाड़ी बादल ,
अपने पुराने यार का इंतज़ार करता सा लगता है
आँखें बिछाये सा खड़ा लगता है

दोहे....


सौ सौ नखरे ना दिखा कर ले झटपट काम
आज जरा कुछ सीख ले कल करना आराम
रिश्ता मेरी सोच का ,कागज़ को भी भाय
जब भी सुन्दर मैं लिखूं ,कलम यही इतराय
ऐसी बातें ना करो ,होता रहता काम
आज मिली कल ना मिले ,दोहों वाली शाम
हमें बड़ा फल चाहिए ,जैसे हो तरबूज
जब भी बदली सोच तो ,कहलाये खरबूज
घड़ा उठाकर मैं चली ,तू क्यूँ पीछे आय
नज़रें मुझपर गढ़ रही ,घड़ा मंद मुस्काय
सींचूँ सपना प्रीत का ,लिखकर सुन्दर गीत
कागज़ कलम दवात ला , ये मेरे भी मीत
सब को सब कुछ चाहिए ,ज़िद है या कि लगाव
राग द्वेष सब भर लिया ,दम्भ भरी ये नाव
धीरे धीरे अब भला ,कछु ना होता काज
सब्र पुराना हो गया , वक़्त नया सरताज
माली मेरा बांवरा ,कोशिश करता जाय
फलदायी या ठूंठ हूँ ,पानी देता जाय
हौले हौले रे मना तू भी तो कुछ बोल
ऐसा मौका ना मिले राज़ दिलों के खोल

मेरी लेखनी....


बहुत देर से मैं ......
बैठी हूँ एक ख़याल के साथ
अल्फ़ाज़ों को पहन उतार कर देखती हुई
लफ़्ज़ों के पर्याय ढूंढ़ती हुई
शब्दों को धोकर पोछती हुई
मिसरा बदल कर बिछाती हुई
एहसास तेह लगाती हुई
काफ़िया कतार में सजाती हुई
लय कभी बहर उधार लाती हुई
ख़याल से बोरियत मिटाती हुई
विचारों की पुनरावृति घटाती हुई
भारी को हल्का कराती हुई
अतिश्योक्ति कर हंसाती हुई
शेरो में दिल बसाती हुई
इत्तू इत्तू शब्द घुसाती हुई
अनेकार्थी शब्द भिड़ाती हुई
बदरंग कोशिश में रंग भरती हुई
आम बात नए लिबास में पेश करती हुई
मिलते जुलते शब्दों की बंदिश करती हुई
उर्दू के शब्दों से खूबसूरती गढ़ती हुई
पर हर बार कल्पना का स्पर्श कराती हुई
मैं लिखती हूँ .......
अपने ख़याल को कागज़ पे खड़ा करती हूँ आपकी नज़र करती हूँ

हक़दार.....


ख्वाबों से सजे अर्श पर
लेटे लेटे फर्श पर
दोस्तों ने बादलों को पढ़ा 
आफताब उसे
मुझे एक खंजर दिखा
जाने कब लकीरें उलझ गयी
जाने कब दोस्ती झुलस गयी
हक़दार तेरी दोस्ती के
हम भी तो
शायद कभी थे ,
शायद नहीं थे
ख्वाबों से सजे अर्श पर
लेटे लेटे फर्श पर
मुहब्बत ने बादलों को पढ़ा
मुझे पूनम का
उसे ईद का चाँद दिखा
मैं शर्म में बुत बन गयी
वो धर्म में ताबूत बन गया
हक़दार तेरी मुहब्बत के
हम भी तो थे
शायद कभी थे ,
शायद नहीं थे

चिकनी ख्वाइशें .......

चिकने किरदारों सी चिकनी ख्वाइशें
हाथ लगती तो हैं हाथ आती नहीं
लकीरों ने ही सोख ली अपनी व्यथा
बेटी की माँ अब सर झुकाती नहीं
पर्दों में भी महकती है मेरी बुलंदी
हया कहती तो है ,सुनाती नहीं
पर देश भेज दी बगिया की कली
पीहर की हवा भी जहाँ जाती नहीं
रिश्तों में साँचे सी ढलती जाती
सलवटें मेरे माथे पे आती नहीं
अपना वजूद लेकर छा जाऊँगी
बंधी डोर की उड़ान भाति नहीं

वजूद

ऐसे में क्या मांग लेंगे वो हमसे 
वजूद ही थमा दिया था 
जब पहली बार वो मिले हमसे

अस्तित्व.....

लो आज फिर खड़े हो गए तुम 
मेरी देहलीज़ पर 
 रिक्त हाथ .....
उससे भी रीता मन लिए 
बस नज़रे मुझ पर 
या मेरी खूबसूरत चीज़ पर    

हर हिसाब रखा है मैंने ...
जब जब काली कूंची फेरी तुमने
निर्मल तन पर 
 निश्छल मन पर  
किया प्रहार मेरे अस्तित्व पर 
दागा प्रश्न मेरे स्त्रीत्व पर  

बदरंग किया है मेरा स्वरुप 
बदल के रख दिया है मेरा प्रारूप    
पलट के देखो तो सही .....अपना भूत  
बिखरा मिलेगा मेरा लहूलुहान ......वजूद  
शोषित वत्सला  
द्रवित अबला 
अपेक्षित ममता 
 नुचती सुंदरता 
दूषित सलिला 
 पीड़ित निर्बला

अब भी चेत जाओ !
रख लो मेरा मान   
जला लो इक लौ .....आत्मीयता की 
 टांग दो इक सूरज .......समानता का  
की दहक गयी अबकी 
तो लिहाज़ न रखूंगी 
तेरे अभिमान का 
तेरे झूठे गुमान का           

यात्रा

प्रेम सबसे कम समय में तय की हुई सबसे लंबी दूरी है... यात्रा भी मैं ... यात्री भी मैं