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सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

कई दिन हुए .........

कई दिन हुए .........

वक़्त गीला सा है ,
फिसल नहीं रहा 

मन जमा सा है ,
पिघल नहीं रहा

नकाब ओढ़ा सा है ,
ढल नहीं रहा 

जवाब दिया सा है ,
हल नहीं रहा

इश्क जर्रा सा है ,
महल नहीं रहा 

दर्द असल सा है ,
नक़ल नहीं रहा 

रिश्ता रूठा सा है ,
संभल नहीं रहा 

आंसू टंगा सा है ,
टहल नहीं रहा 

साथी तिनका सा है ,
संदल नहीं रहा 

ख़याल उतरन सा है ,
पहल नहीं रहा 

अंदाज़ रुखा सा है ,
ग़ज़ल नहीं रहा 

जिस्म टूटा सा है ,
चल नहीं रहा 

वो खफा सा है ,
बहल नहीं रहा 

लम्हा चिपका सा है ,
बदल नहीं रहा

कई दिन हुए .....
सब कुछ रुका सा है 
कल्पना का आसमान
झुका सा है

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