शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

आदमी......

रिश्तों को तो रोज़ .....ढोता है आदमी  
फिर क्यों बिछड़कर ....रोता है आदमी  

 दिन भर सपने ..... कौड़ियों में बेचता
 रात फिर इक ख्वाब ..बोता है आदमी 

 चाँद पाकर भी ... उस अर्श को ताकता
 ऐसा भी गरीब .....क्यों होता है आदमी  

मायूसी की चादर ...हौसले का बिछौना  
ओढ़ माँ की दुआ ....फिर सोता है आदमी   

रात की चाह में ......सूरज को निगलता
सब्र चुटकियों में ......यूँ खोता है आदमी

 

15 टिप्‍पणियां:

  1. अज़ीब सी फितरत को पालता हैं उम्र भर
    जिसके लिए हँसता उसी के लिए रोता आदमी

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  2. अज़ीब सी फितरत को पालता हैं उम्र भर
    जिसके लिए हँसता उसी के लिए रोता आदमी

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  3. स्तव्ध हूँ ..आज के आदमी का सच यही है 😐

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  4. स्तव्ध हूँ ..आज के आदमी का सच यही है 😐

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  5. अपनी फितरत कहाँ भूलता है आदमी .........

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मिलन......

भीग जाने के लिए मेरे पास पहाड़ बहुत थे ..... फिर तुम्हारी रेतीली आंखों से मिलना हुआ...