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शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

ज़िन्दगी ......



(1)
"गुलाब " दिखाकर......
 ज़िन्दगी ......
"खट्टे अंगूर" बेच देती है 
वो भी .....
बिना किसी "इश्तेहार" के 
और हम....
ठगे से जाते हैं .....
ज़िन्दगी के इंतज़ार में

 कारोबार .......अच्छा है ज़िन्दगी तुम्हारा 
 पर क्या करें ....."इश्क" भी तो लट्टू है हमारा 

(2)
सुनो .....
मेरी छत पर ....
वो "ज़िन्दगी का टुकड़ा " रहने दो 
अब ...."चाँद "से दिल उकता गया 
इस फ़ेर.....
"नाज़नीना" पर दिल आ गया

(3)

दिन गुज़र गया 
लिबास ......बदलते बदलते 
कई किरदार .......बदलते बदलते 
अब तो
 कुछ लम्हे तोड़ लो 
उस मसरूफ ज़िन्दगी से 
और 
मेरे हथेलियों में ......धर दो 
सिर्फ 
तुम्हारे लिए हैं ......कह दो

कल्पना पाण्डेय

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