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शनिवार, 30 जनवरी 2016

किरदार.....


जिंदगी के रंगमंच पर उतरा हुआ,
रोज़ नया किरदार निभाता हुआ,
कभी नकाब, कभी मुखोटा पहना हुआ,
कभी इसका  कभी उसका जामा पहना हुआ, 
कभी नकली ,कभी बिलकुल असली लगता हुआ, 
इंसान
 
परिस्थिति की उँगलियों पर नाचता हुआ,
जरूरतों की भांति पात्र बदलता हुआ,
कभी थके, कभी जोशीले संवाद कहता हुआ,
उस किरदार को जीता हुआ ,पर अपने व्यक्तित्व को खोता हुआ,
कभी मुस्कराता- रोता हुआ ,यूं ही जीता मरता हुआ,
इंसान
 
वक़्त कहाँ उम्र गुजारता हुआ
शायद कल सँवर जाए , इस भ्रम में जीता हुआ
कभी तालियों , कभी गालियों की गूंज सुनता हुआ
पात्रों की भीड़ में अपनी बची--खुची पहचान खोजता हुआ
पल पल जानदार अभिनय करता हुआ
खुद को मारकर,हर किरदार जीवंत करता हुआ 
इंसान 
 
 
सच्चा निभाता हुआ, झूठा छिपाता हुआ
दानी बांटता हुआ, कंजूस समेटता हुआ
अमीर भोगता हुआ, गरीब रोकता हुआ 
ज्ञानी खोजता हुआ ,मूर्ख दोहराता हुआ
आलसी सोचता हुआ, स्वार्थी नोचता हुआ
ढोंगी दिखाता हुआ ,क्रोधी जलता हुआ 
रोगी कराहता हुआ ,जोगी त्यागता हुआ 
निंदक उगलता हुआ ,विजयी बदलता हुआ
पराश्रयी ताकता हुआ, मेहनती जागता हुआ
ग्रहस्थ ढोता हुआ, अभयस्थ वही करता हुआ
बचपन सीखता हुआ, यौवन सँवरता हुआ
बुढ़ापा  अनुभव घसीटता हुआ ,लाचार कडवे घूंट पीता हुआ
 
ऐसे ही कई अनगिनत पात्रों को जीता हुआ
 थका हारा बिलकुल पस्त होता हुआ
इंसान आखिरकार थक जाता है
ऐसा इंसान जैसा भी हो, जो भी हो ,जहां भी हो
अंततः अपना नाम और व्यक्तितित्व को  सिरहाने में रखकर
सोता कहाँ? मर जाता है
फिर कोई अभिनय नहीं ,
कोई किरदार नहीं,
कोई मंच नहीं,
सिर्फ निद्रा  .........
शायद चिर निद्रा...................................

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