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गुरुवार, 28 जनवरी 2016

रंग बदलते रिश्ते......

रिश्ते …..जो पहले रंग बदलते
रंगों की आड़ में ढंग बदलते
और फिर जाने क्यूँ
अपना संग बदलते
भटकते भटकते
एकाकी रिश्ते

यूँ ही…..
एक दूजे को खटकते रिश्ते
अब महज कसते रिश्ते
फिर कैसे निभते रिश्ते
ये तो बस रिस्ते रिश्ते
नाम के बस ऐसे रिश्ते
तंज से फिर चुभते रिश्ते

अपने में ही घुलते रिश्ते
भूले बिसरे मिलते रिश्ते
बिखरे हुए अब सिसकते रिश्ते
कभी चार दिवारी फांद कर …..
दूर दीखते रिश्ते
कभी अपनों के ही दिलों में …….
कुकुरमुत्ते से उगते रिश्ते

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