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सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

मेरी नजर से ….......... मंजुला दीदी !

मेरी नजर से ….......... मंजुला दीदी !

मैंने उसे देखा है ….......

अपनों से अपने लिए लड़ते हुए
अपनी पहचान को अपना व्यक्तित्व बनाते हुए
पतली सी होकर भी वज़नदार हौसला लिए हुए
छोटी सी नौकरी में भी अपना अस्तित्व टिकाते हुए
हवा के विपरीत अकेले बेखौफ़ अपनी नैय्या खेते हुए
सब कुछ कर सकती हूँ ,ऐसी पहचान बनाते हुए

घर का छत -आँगन ही नहीं ,हर ओना -कोना साफ़ करते हुए
टूटे डिब्बों में भी फूल उगाकर घर बगिया में बदलते हुए
गरीब बच्चों के लिए स्कूल तक पुराने कपडे ढोते हुए
सुबह-शाम नियम से रेम्बो को खाना देते हुए
अल्मोड़ा की गलियों को चुटकी में नापते हुए
स्कूटी में हवा से बातें करते हुए

घर से बाज़ार ,बाज़ार से घर छोटा -बड़ा सामान ढोते हुए
हिसाब को हिसाब की तरह साफ़-साफ़ बताते हुए
ऐन मौके में जरुरत पूरी कर सबके लिए हनुमान बनते हुए
दोस्तों के लिए किसी भी हद तक कभी भी गुजरते हुए
बेटी होकर भी बेटे का फ़र्ज़ निभाते हुए

कभी अपने ,पर उससे भी ज्यादा दूसरों के दर्द में रोते हुए
छोटी-छोटी खुशियों को सीप में मोती की तरह संजोते हुए
दूर दराज़ छोटे बड़े सभी मंदिरों में भगवान् को मनाते हुए
खाने की सुध नहीं ,हाथ में चाय का लोटा थामे हुए

पाण्डेखोला में हर छोटे बड़े से रिश्ता निभाते हुए
कक्का के बाद भी अपनी इजा की मजबूत दीवार बनते हुए
अपनी शादी की बात पर गुस्से में सब पर बिफरते हुए
लेकिन भाई की शादी में पिता जैसा फ़र्ज़ निभाते हुए

अपने स्वाभिमान को और भी ऊंची चट्टान पर बिठाते हुए
अपने नाम से उलट एक अजीब सी निर्भीकता लिए हुए
कभी नम्र ,कभी उद्दण्ड ,कभी कोमल ,एक साथ कई नकाब ओढ़े हुए

ऐसे में अचानक एक एक कर हर दिन हमने देखा दीदी को बदलते हुए
पक्की ऊँची दीवार पर काला सूरज ढलते हुए
बीमार होकर भी जिम्मेदारी पूरी निभाते हुए
विश्वास के अलावा शरीर भी शिथिल पड़ते हुए
हर पल, हर क्षण कैंसर से जूझते हुए
हर इलाज, हर प्रार्थना को आजमाते हुए
ठीक हो जाने की उसकी ज़िद्द को बिखरते हुए
सबकी सहारा रही दीदी को सहारा लेते हुए
चुप्पी साध कर अपना दर्द छुपाते हुए
न खा पी सकने की असमर्थता में रात गुजारते हुए
सूनी आँखों से हमसे ठीक हो जाने का प्रश्न पूछते हुए
बढ़ते दर्द के साथ अपनी उम्र कम करते हुए
छोटी सी उम्र में तमाम दर्द सहते हुए

उस दिन मंजुला दीदी शांत हो गयी
मंटा -मंटा कहने वाली काकी मत जा ,मत जा , कहती रह गयी
दूर कहीं मंजुला दीदी विलीन हो गयी
स्वाभिमानी मंजुला आखिर दर्द विहीन हो गयी
मंजुला सबका मन जला कर चली गयी
मंजुला सबका दिल झुलसा कर चली गयी

आज फिर मैंने उसकी तस्वीर को दीवार पर लटका देखा है
हँसते हुए कह रही थी ….....इज्जी बाज़ार से कुछ लाना ?

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