Follow by Email

रविवार, 31 जनवरी 2016

वो मुलाकात......


उस रोज़ "ज़िन्दगी "मिली
सजी धजी
सोलह श्रृंगार किये 
मैंने रास्ता रोक लिया
और सवालों की झड़ी लगा दी ......

सुन !
तू चुपचाप
सीधे चलना कब सीखेगी ?

क्यों भाता है तुझे दोराहे पर खड़ा होना ?
और फिर खोखले रिवाजों के खातिर बड़ा होना

क्यों चाहती है अस्तित्व को परखना ?
और फिर रिस्ते रिश्तों को कांधों पर ढोना

क्यों जरूरी है तेरा हर मोड़ पर मुड़ना ?
और फिर झुकना -गिरना ,बस शून्य होना

क्या सही है मुझे धुंध भरी राह में धकेलना ?
और फिर मुझी से लुक्का - छिप्पी खेलना

कब छोड़ेगी सुख दुख के झूले को पींगे देना ?
और फिर यूँ हवा में टंगा देना

"ज़िन्दगी "निहायत ही कातिलाना अदा से बोली
मेरे "हुज़ूर "
मेरे "हमनवा "
आपको खुबसूरत "शक्ल "दे रही हूँ
इन अनुभवों में पीस के "अक्ल "दे रही हूँ
और
एक मीठे पान की गिलौरी
मेरे होठों पर धर दी

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें