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रविवार, 24 जनवरी 2016

इज़हार......

इज़हार......


चाँद तुम भी न ......
बिलकुल
"जीरो बट्टा निल" लगते हो 
इश्क के मामले में
अलग अलग भेस धर के
क्या सोचते हो
मुझे ठग लोगे तुम ?
रात की काली चदरिया ओढ़ लो
या तारों वाली अचकन पहन लो
अपना स्पर्श कैसे बदल लोगे तुम ?
जान छिड़कती है चांदनी मुझ पर
राहों में उसकी कैसे दखल दोगे तुम ?
लाख छिपाना चाहो ये पैगाम
जो तुम मेरे लिए दिन भर
छिप छिप कर लिखते हो
सूरज की नज़र से
बचा बचा कर रखते हो
दे क्यों नहीं देते ?
कह क्यों नहीं देते ?
कब उस जीने से
उतर कर नीचे
मेरे करीब आओगे तुम ?
तुम्हारा हूँ .....कहोगे तुम
तुम्हारे लिये
रात भर चला हूँ ......कहोगे तुम
कह दो न आज ......
आज तो .....बस कह ही दो
या
उम्र भर मेरे लिए
यूँ ही "जीरो बट्टा निल" ही रहोगे ?
बस गोल गोल ....चाँद जैसे
मेरे लिए ...... चमकते शून्य जैसे

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