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रविवार, 31 जनवरी 2016

शब्द और...... रिश्ते

जब "शब्द"अपनी राय खो दें
बचा खुचा अभिप्राय खो दें
अहम - वहम में चोट खाकर 
हर लाज़िमी उपाय खो दें
तो
" रिश्तों " से कहें ......
कुछ समय आराम कीजिये
शब्दों को विराम दीजिये
नयी पहल का लेकर नज़राना
रूठे हुओं को थाम लीजिये

ख़ामोशी में
"शब्द " बड़े तेज़ धड़कते हैं
और वही कहते जाते हैं
जो हम तुम सुनना चाहते हैं
फिर
कोई आहट नहीं
कोई शोर नहीं
शांत से बहते "रिश्ते "
शब्दों की डोर से बंधे

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