Follow by Email

शनिवार, 30 जनवरी 2016

फासला......

न लफ्ज़ रहे .....
न लम्स रहे ......
 जाता हुआ लम्हा रहे  ......
तेरे मेरे दरमियान .....
ये भी क्यों "फासला" रहे ?

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें