शनिवार, 30 जनवरी 2016

कुछ मुझ में नदी सा कर दे......

कुछ कुछ मुझ में
नदी सा कर दे
जो गढ़ गया है ,
और बस पड़ा है ह्रदय में
उसे तरल , गतिवान कर दे

उस जैसा ही
शोख और मीठा कर दे
कि जिंदगी का समुन्दर पी सकूँ
ये खारापन जी सकूँ
बस बहती जाऊं
इक दिशा लिए
निस्वार्थ आशा लिए

उसकी सी गहराई दे
कि उथली
न नज़र आ सकूँ मैं
किसी भी ओने कोने से
इतना उफान भर दे
की त्रुटियों की काई
जमने ही न पाये मुझमें

रुकूँ नहीं उस जैसी
अथक रहूँ
हर चट्टान भेद सकूँ
वो ….अपना
मैं ….उस जैसा
प्यासा सफ़र रोज़ तय करूँ

लिख सकूँ
अपने सुख – दुःख की दास्ताँ
अपने ही पानी में
ठीक उसी की तर्ज़ पर
और बाँचती फिरूँ
बलखाती फिरूँ

किनारे से लग कर खड़े हुए
मुझसे बिलकुल सटे हुए
हर वजूद को छु सकूँ
अपना अस्तित्व बाँट कर भी
कायम रख सकूँ
अपना सुकून
अपनी निर्मलता
अपनी बेफिक्री
अपना वेग
अपना सफ़र
और वही नदी वाला अपना सागर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

अद्धभुत हूँ मैं

खूबसूरत नहीं हूँ... मैं    हाँ ....अद्धभुत जरूर हूँ   ये सच है कि नैन नक्श के खांचे में कुछ कम रह जाती हूँ हर बार   और जानबूझ करआंकड़े टा...