रविवार, 31 जनवरी 2016

दरार....


ये बेहद नज़दीकियां
रिश्तों में
बस इक “दरार” की सी
जगह छोड़ देती है
जिसमें 
आह……परवाह
अहम् ….. वहम
शिकवे ……गीले
शौक …..आदत
जिद्द……. ख्वाब
सुकून…… जूनून
मसरूफियत …… हैसियत
इतना कुछ भर जाता है कि
“इश्क काफूर ”
हुआ सा लगता है
मुहब्बत के जगह जगह
पैबंद लगने लगते हैं
और ये दरार
ढांक दी जाती है
“हम – तुम “तब भी बंधे रहते हैं
रोज़मर्रा की तरह
तू मुझमें समाया सा “बस”
और मैं तुझमें बसी सी “बस”

फिर …….
ये कुछ पल की दूरियां
हमें कुछ आभास दिलाती हैं
“तेरे – तुम” की चाहत
“मेरे – मैं” को बहुत याद आती है
खुले आसमान की भांति
अपार जगह लिए हुए
इन दूरियों में
“दरार वाला सब”
बिखर जाता है
सब बेमायने हो जाता है
तब पैबंद नहीं रहती मुहब्बत
इक मखमली कालीन सी
बिछ जाती है
जहाँ “मैं और तुम ”
इक बार फिर लोट लोट कर
तर – बतर हो जाते हैं पुराने वाले
अपने नए नवेले से रिश्ते से
वही पुरानी सी कशिश लिए
एक कसक से सरोबार
सच है
दूरियां पास लाती है
बहुत पास

फिर कायम हो जाती हैं
बेहद नजदीकियां
जो नीव है तेरे मेरे सम्मान की
हमारे रिश्ते के एहतराम की

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Notes.....

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