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रविवार, 31 जनवरी 2016

क्या हम सफल हैं?.....


जो कभी था बहुत सफल ,
क्यों यकायक होने लगा है विफल,
ऐसा नहीं की प्रयासों मे कमी सी है,
जाने क्यों रफ्तार मे लिपटी सफलता थमी सी है
शायद ,
हर दिन वही ऊंचाई लांघना,
एक सा आसमान छूना,
सोच और उत्साह को सीमित करना, कथनी करनी का ढर्रा निश्चित करना,
जाँचे परखे विकल्पों को तव्वजो देना,मैं सिर्फ मैं की सुनना,
कामयाबी को पुरानी करने लगता है
सफलता का स्वाद चखते ही ,मनुष्य खुद को भूलने लगता है
अभी-अभी पाई खुशी को धन,यश और अहंकार का मिश्रण बना पीने लगता है,
अपने आप मे रमा - रमा अपने वर्चस्व के साथ अकेले जीने लगता है
पास आती हर वस्तु ,हर इंसान को अपने हिसाब से तोलने –मरोड़ने लगता है
धीरे –धीरे अपनी तय ऊंचाई पर खड़ा ,सफलता पुरानी पड़ते ही खास कहाँ रहता ? आम हो जाता है
उच्च कहाँ रहता ? समतल हो जाता है
ऐसी सफलता टिकती नहीं ,कुछ देर ठिठक कर खड़ी रहती पर ताश के पत्तों की इमारत सी ढह जाती

ढहती सफलता टिकने के लिए हथेली पर राई उगानी पड़ती है
सोच ही नहीं ,राह बदलनी पड़ती है
उम्मीद थाम कर ,मेहनत दुगनी करनी पड़ती है
निरंतर लक्ष्य के साथ साथ ढंग बदलने पड़ते हैं
हालात और इंसान बराबर परखने पड़ते हैं
वक़्त और आत्म संयम को प्राथमिकता देनी पड़ती है
ऐसी आई सफलता ढहती नहीं, बरकरार रहती है
नई बरकरार रहती सफलता का ओज़ बुझता नहीं ,दिव्यदीप सा प्रज्वलित रहता है
हर नई सुबह के साथ ,नई प्रेरणा से ओत-प्रोत,
नए लक्ष्य की चमक सफलता को फिसलने नहीं देती, टिका कर रखती है

सफलता ,
बरकरार सफलता ,
लेकिन सबसे जुदा है स्थायी सफलता
इसे पाते ही टिकाने – ढहने का डर नहीं रहता
ऐसा सफल हर कोई नहीं , सिर्फ कोई कोई होता
बेदाग छवि, नेक ऐसा चरित्रवान होता
परोपकार और परमार्थ ही एकमात्र ध्येय होता
स्थायी सफलता का कार्य क्षेत्र मानवता और मानव से जुडा मन होता
ऐसी – वैसी कामयाबी तो सबके हिस्से की सब को मिलती
लेकिन सफलता स्थायी रखने की क़ुव्वत हर किसी मे कहाँ होती ?

सम होकर , उच्च बनना ...... जरूर कुछ अलग बात होती
लेकिन उच्च होकर सम मे विलीन हो जाना ,उसे आसमान दिखाना......... ये सबकी आस नहीं होती
सबके बस की बात नहीं होती

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