रविवार, 31 जनवरी 2016

पुराना होने का दुःख.....



आज मन कुछ ढूंढ़ रहा है,जाने क्या गुम खोज रहा है ?
ऐसा कुछ जो अनजाना सा,ना जाना पर पहचाना सा

सुनी नजरे,खाली मन ,यहाँ वहां ,कभी इधर उधर
देख पुराने कमरे को ,जम गयी उस पर मेरी नज़र

घुप्प अँधेरा तन्हाई भरा ,सूना -सूना ,मरा -मरा
हलके हलके, जरा -जरा , कोई बोला डरा -डरा

आई हो तो चिटखन खोलो,कोई न लेता तुम सुध ले लो
हममे भी थी कभी कुछ बात ,अगर न पड़ती वक़्त की लात

हाथ बढाकर चिटखन खोली, रखी चीज़ें कुछ न बोली
धूल भरी जब आँखें खोली, मुस्काई वे हौली -हौली

अलमारी में थी बंद घडी ,हाथ लगाते बोल पड़ी
अच्छा-बुरा समय है बीता, कुछ-कुछ हारा ,बहुत कुछ जीता
हार जीत मुट्ठी में बांधे
पकड़े -पकडे थक गयी हूँ ,थक गयी ,तो रुक गयी हूँ

अलमारी में उलटी पड़ी एक लालटेन ,
उजाले को हाथ देती ,अँधेरे को गले लगाती थी लालटेन,
कराह कर टूटे कांच में से बोली
जिंदगी गुजार दी अंधेरों को पोछते हुए ,आज खुद हूँ अँधेरे से लिपटे हुए

अलमारी में दिखा एक चटका आइना ,
अपनी दरार से उभर कर ,बोला वह आइना ,
रंग और रूप ही नहीं ,आत्मा को मुझ में देखा है
अब कुरूप हो गया मन,बिक गयी आत्मा,तभी तो टुटा हुआ मुझे यहाँ फैंका है

अलमारी मे थे कुछ ताश के पत्ते ,
अपने साथियों से बिछुड़े ,आधे अधूरे पत्ते ,
कभी जीते ,कभी हारे ,जब जब बिछे ये पत्ते
जुऐ में जीत कर साथी खो दिए, जिंदगी में हार कर रिश्ते खो दिए

अलमारी में दिखा मुड़ा-तुड़ा कागज़ का टुकड़ा
चिट्ठी थी शायद,लिखा था दिल का दुखड़ा
पीले पड़े कागज़ पर,स्याही भी धुल गयी थी
धुंधले शब्दों में जिसके नाम की चिट्ठी थी ,वो कब की चिर निंद्रा में सो गयी थी

अलमारी में पड़े थे कुछ सिक्के
कभी हाथ बदलते थे ,अब खारिज हो चुके ये सिक्के
खन -खन बोले मायूस हताश
नए का स्वागत ,पुराने की गत्त ऐसी ,इंसानी फितरत ही ऐसी

अलमारी के कोने में ख़ड़ी थी एक कलम ,
घिसी हुई,टूटी बुदबुदाई कलम,
पुरानी हूँ ,पर आज भी मुझ में बहुत है दम ,
लिखूं क्या ? भावना -जज़्बात हैं नहीं ,अलफ़ाज़ भी हो गए है कम

अलमारी के दाएँ तरफ़ पड़ा था चश्मा ,
मोटे से फ्रेम वाला ,खरोंचों से भरा चश्मा ,
बोला शीशा मलते मलते
अच्छे -बुरे लोग दिखें हैं चलते- चलते ,
नज़र का धोखा है,
अच्छाई भी चलती है ,बुराई के साथ गले मिलते -मिलते

अलमारी में तमाम चीजें थी धूल में पड़ी
सब पर पुराने और बेकार होने की लानत पड़ी
आंसू से मैं पोंछ रही थी
ये क्या ढूंढा ? सोच रही थी
नया -पुराना, आना -जाना ,
जिन्दगी गाती अजब तराना
नया है तो नवीन, नवीन है तो पुरस्कृत ,
पुराना है तो प्राचीन ,प्राचीन है तो तिरस्कृत ,
समय का पहियाँ नापता यहाँ हर तोल
नया है तो अनमोल,पुराना है तो बेकार-बेमोल

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Notes.....

Fantasy... One day I will rewrite myself  . Let me be you on this reincarnation  day . Skill.... Love uses its absence to be seen and to...