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गुरुवार, 28 जनवरी 2016

बिन मौसम की बरसात

इस बिन मौसम की
बरसात का गीलापन
कइयों के
आने वाले दिनों को
भीगा गया है

उस किसान का
हरा भरा फख्र
बह गया है अभी अभी

वो आम के पेड़ों पर
बौराया सा बौर
जिक्र भर रह गया है
सुना है अभी अभी

आस का फूल
विश्वास का फल
सब दब गए हैं
इक बौछार में
अब खिल न सकेंगे
फिर से कभी

और तो और
वो “सूरज” भी
मध्यम कर चुका है
अपनी लौ
इस असमंजस में
कि कल भीगा भीगा
जल भी सकूंगा ?
कि कल भी नहीं ?

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