शनिवार, 30 जनवरी 2016

वो लम्हा ……

वो लम्हा ……
इक ख्याल लाता है
कैनवास पे दिल के
रंगों के ,कभी छींटे,
कभी लकीर मार जाता है

ये छींटे ,उन लकीरों का
आलिंगन पाते हैं
और
मुझे कुछ अक्षर
टहलते नज़र आते हैं

ये टहलते अक्षर
मेरे करीब…..
बहुत करीब आते हैं
आंच पाते
लफ्ज़ हो जाते हैं

इन लफ़्ज़ों को
रखने की जगह
ढूंढती हूँ
करीने से सजा
अर्थ फूंकती हूँ

अर्थ पाते ही ये
लफ्ज़ बहने लगते है
कहाँ भरूं ?
कलम में भरते ही
कुछ कहने लगते हैं

बहते कहते लफ्ज़
कस लेती हूँ
इन्हें लय देती हूँ
कभी उड ना जाएँ
इसलिए लिख लेती हूँ

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

कनेर

"कनेर"  तुम मुझे इसलिए भी पसंद हो कि तुम गुलाब नहीं हो.... तुम्हारे पास वो अटकी हुई गुलमोहर की टूटी पंखुड़ी मैं हूँ... तुम्हें दूर ...