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रविवार, 24 जनवरी 2016

बाज़दफा ......

बाज़दफा ......
दिल करता है
कुछ नया करने को
अपना कुछ रचने को
आज फिर दिल किया .......
उठा लायी बीते पलों की मिटटी
धर दी "कल्पना की चाक" पर
लगी कुछ गढ़ ल
चाख आगे धकेला
खुद पीछे लुढक गयी
मुस्कुराई .......
लजाई ......
अपने से कुछ बुदबुदाई
फिर रीता किया खुद को
और .....
उभार लिया
सोंधी सी खुश्बू वाला ....
मेरे लिए जिद्दी आँखों वाला ......
अब तलक मेरा नाम लेने वाला ......
इक चेहरा
और फिर जैसे..... शून्य हो गयी
इक बार फिर .....
हार गयी
असमर्थ हूँ
कुछ नया रचने को .....
सिलसिला यही है बरसों से
कुछ नया रच ही नहीं सकती
शायद
सोच में पड जाती हूँ ...
बाज़दफा......

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