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रविवार, 24 जनवरी 2016

बागबानी......

बागबानी......
आज यूँ ही गुमसुम उदास बैठी थी
बैठे बैठे
रुस्वा ख्वाब की कली पर तन्हाई छिड़क रही थी
छिड़कते छिड़कते
बंजर याद के झुरमुठ उलट पलट देख रही थी
देखते देखते
अधजली ख्वाइश की सूखी पतियाँ नोच रही थी
नोचते नोचते
बिखरी उमींद  का लटका सा फूल ढूंढ रही थी
ढूंढते ढूंढते
टूटे वादे की जड़ को अश्कों संग दबा रही थी
बस ऐसे ही ठूँठ सी
याद को जिला रही थी
किसी ने प्यार से पूछा .....
कल्पना तुम रो रही थी ?
मैंने कहा .......नहीं तो
बस बागबानी कर रही थी



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