रविवार, 24 जनवरी 2016

बस यूँ ही......



मुझमें अब तक तू ही गुजर रहा है
तू ही वक़्त , तू ही सफ़र रहा है
बेहिसाब जख्म हैं ,तेरे नाम के
मलहम भी तू ,तू ही सबर रहा है
बुलबुला तेरी याद ,का जिद्दी है
जितना दबाऊं ,उतना उभर रहा है
फैला काजल ,नैन कुछ कहते नहीं
कुछ नाराज सा ,आँखों से झर रहा है
कुछ तो बात जरूर है हम में आज
सूरज देख ,चाँद भी जीना उतर रहा है



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यात्रा

प्रेम सबसे कम समय में तय की हुई सबसे लंबी दूरी है... यात्रा भी मैं ... यात्री भी मैं