रविवार, 24 जनवरी 2016

मन सा...... सूरज

ख्वाइशों का क्या है ......
ये तो असीम है
सागर में उठने वाली
असंख्य लहरें कह लो

इन ख्वाइशों को
उजास देने वाले
तुम हो .... मन
तुम्हें सूरज कह दूं ?
जैसे सूरज
तपिश कहते कहते ....
सुनेहरापन
उजलापन
लीप देता है सब पर
तुम भी क्या कम सूरज हो ....मन ?
तन से लेकर मन पर
दिल से लेकर दिमाग पर
मेरी ख्वाइशों को सेक देने वाले 
सुबह से लेकर साँझ तक
दिन से लेकर रात तक
सुनहरा हो जाने तक संग रहने वाले
मन ..... तुम्हें सूरज कह दूं ?

बेहद रूमानी है ये जोड़ा 
सूरज .... समुंदर का 
मन और ख्वाइश का
उगने ...  डूबने वाला
डूब कर ....उगने वाला
सुनहरी .....सेक वाला
रोज़ नयी .....उल्लास वाला

कल्पना पाण्डेय

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

बिम्ब

एक शब्द लिखकर सैंकड़ों बिम्ब देखोगे? लिखो.... "प्रेम" मैं चुप थी पर चुप्पी कभी नहीं थी मेरे पास अब बस चुटकी सा दिन बचा है । अप...