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रविवार, 31 जनवरी 2016

ऐसा क्यों है?....

यहाँ वहां के बीच ……………………. ऐसा क्यों है?

वहां इतना सुकून ,
यहाँ इतनी हलचल क्यों  है?

वहां मन ठहरा हुआ निश्चिन्त ,
यहाँ बेचैन ,मचलता क्यों है?

वहां दिन निकलता ढलता सा,
यहाँ चुटकी में कटता क्यों है?

वहां खुली छत के ऊपर चाँद -तारे बसते ,
यहाँ मेरी छत पर किसी और का बसेरा क्यों है ?

वहां बच्चों का बचपन खुला आँगन ,
यहाँ खिल्लोनों से भरा बंद कमरा क्यों है ?

वहां यौवन घूँघट में  भी खिला-खिला  खूबसूरत यहाँ नक़ाब  ओढ़े हुए डरा -सहमा क्यों है ?

वहां का बादल पारदर्शी ,छूकर  गुजरता हुआ यहाँ धूएँ से बना विषेला क्यों है?

वहां पेड़ -पोंधे मुस्कुराते हरे भरे ,
यहाँ धूल से ढके,कृत्रिम बस खड़े भर क्यों हैं ?

वहां हवा पानी दोनों ताज़े ,बहते हुए ,
यहाँ दोंनों रुके से बदबूदार क्यों है?

वहां जीव- जंतु खुद आहार ढूंढ़ते ,
यहाँ पराश्रित मनुष्य की जूठन पर निर्भर क्यों है?

वहां दूर तक खेत -खलिहान हरियाली,
यहाँ बागवानी केवल गमले तक सीमित क्यों है?

वहां मन ही नहीं हर वस्तु निर्मल,
यहाँ सब नकली -मिलावटी क्यों है?

वहां छोटी सी बाज़ार,हर तबके के लिए एक,
यहाँ हर दुकान जेब के  वज़न अनुसार अपना ग्राहक चुनती क्यों है?

वहां ज़रुरत के हिसाब से आवश्यकता
यहाँ आवश्यकता से ज्यादा जरुरतें क्यों हैं?

वहां आधी रोटी में  भी संतुष्टी ,
यहाँ छलकती थाली भी छोटी लगती क्यों है?

वहां थोडा-थोडा कम-कम  भी अधिक,
यहाँ अत्यधिक-अपार भी थोडा सा कम लगता क्यों है?

वहां लगभग एक सी सादी  पोशाक, तन ढांके  हुए
यहाँ चमकीले भड़कीले वस्त्रों में भी मनुष्य नग्न क्यों है?

 वहां पाठ पूजा नित्य कर्म ,
यहाँ त्यौहार पर भगवन को दर्शन देने की उलटी  प्रथा क्यों है?

वहां बुढ़ापा आदरणीय ,घर की शोभा ,
यहाँ बूढ़े माँ-बाप उपेक्षित ,घर के पहरेदार क्यों है?

वहां  घर छोटे पर  रिश्ते निभते हुए,
यहाँ बड़ा घर पर रिश्ते छूटते -बिखरते क्यों है?

वहां दूसरों से कोई द्वन्द नहीं, सब अपने से ,
यहाँ कोई अपना नहीं,सारे प्रतिद्वन्दी क्यों है ?

वहां लोग अपनी जड़ों को पकडे हुए,
यहाँ दूसरों की जड़ें काटने को आतुर क्यों हैं?

वहां हर बंदा जाना -पहचाना सा,
यहाँ हर कोई अनजान ,अजनबी,या शातिर सा लगता क्यों है?

वहां हर कोई खुली किताब सा सरल,
यहाँ हर व्यक्तित्व उलझा हुआ जटिल परीक्षा का प्रश्न क्यों है?

वहां थोडा-थोडा बचाकर कल के लिए ,
यहाँ ज्यादा से ज्यादा बचाकर कैसे-कहाँ छिपाऊं , ये तृष्णा  क्यों है?

वहां समय और उम्र अपनी गति से गुजरते ,
यहाँ समय फिसलकर, उम्र से पहले बुढ़ापा लाता  क्यों है?

वहां इंसान  फूंक -फूँक कर ,  कदम रखता हुआ ,यहाँ तेज़ रफ़्तार को गले लगाकर ,मरता-मरता भी जिद्द पूरी करता क्यों है?

वहां अपनी पारी पूरी कर  आंखरी सांस लेता,
यहाँ चिंता ,बीमारी या काम के बोझ  से घायल अचानक पारी अधूरी छोडता क्यों है?

वहां वह एक ही बार मरता,
यहाँ हर रोज़ सौदा-समझौता करता हुआ ,पल-पल की मौत मरता क्यों है ?

वहां जीवन शांत ,स्वेच्छा से भरा हुआ,
यहाँ हर पल प्रयत्नशील,मांगता सा,काटता सा लगता क्यों है?

यहाँ और वहां  के बीच हम सब झूलते रहते हैं
हर बार वहां को लांघ कर यहाँ पहुँच जाते हैं
गुण वहां के गाते, मगर माला यहाँ की जपते हैं
सपना वहां का बुनते हैं ,साकार करने यहाँ आते हैं
हम भी पता नहीं ऐसे क्यूँ हैं?


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