Follow by Email

शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

वो मुलाकात....


उस रोज़ "ज़िन्दगी "मिली 
सजी धजी 
सोलह श्रृंगार किये     
मैंने रास्ता रोका
और सवालों की झड़ी लगा दी   ......

सुन   !
तू चुपचाप 
सीधे चलना कब सीखेगी  ?

 क्यों भाता है तुझे दोराहे पर खड़ा होना  ?
और फिर खोखले रिवाजों के खातिर बड़ा होना    

क्यों चाहती है अस्तित्व को परखना ?
और फिर रिस्ते रिश्तों को कांधों पर ढोना 

क्यों जरूरी है तेरा हर मोड़ पर मुड़ना ?
और फिर झुकना -गिरना ,बस शून्य होना   

क्या सही है मुझे धुंध भरी राह में धकेलना ?
और फिर मुझी से लुक्का - छिप्पी खेलना   

कब छोड़ेगी सुख दुख के झूले को पींगे देना ?   और फिर मुझे यूँ हवा में टंगा देना   

"ज़िन्दगी "निहायत ही 
कातिलाना अदा से बोली  
"हुनर  है ये मेरा "
 मेरे "हुजूर"
 आपको खुबसूरत "शक्ल "दे रही हूँ 
 इन अनुभवों में पीस के "अक्ल "दे रही हूँ 
 और 
एक मीठे पान की गिलौरी 
मेरे होठों पर धर दी

कल्पना पाण्डेय

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें