मन बांवरा नहीं ,
पारदर्शी हो चला है
पारदर्शी हो चला है
कुछ गिरहें खोलने ,
कुछ समेटने चला है
कुछ समेटने चला है
आज फिर कुछ कहने ,
कुछ सुनने चला है
कुछ सुनने चला है
फिर चुपचाप उड़ने ,
तुझे छूने चला है
तुझे छूने चला है
पानी था अब तलक,
आज प्यासा हो चला है
आज प्यासा हो चला है
कुछ तुझसे होता हुआ ,
मुझ तक चला है
मुझ तक चला है
मैं तुझमें ....मुकम्मल,
मसरूफ ...
तू मुझमें हो चला है
मसरूफ ...
तू मुझमें हो चला है
कोई टिप्पणी नहीं:
टिप्पणी पोस्ट करें