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रविवार, 31 जनवरी 2016

ज़िंदगी का सा रे गा मा ……………


ज़िंदगी एक साज़…
सुर लग जाये सही ,
तो क्षितिज छू ले इंसान ।

ज़िंदगी एक मुट्ढ़ी रेत……….
बंध जाये, 
तो ऊँची उड़ान
फ़िसल जाये ,
तो हार जाता इंसान |

ज़िंदगी एक सुरीला गान…….
कभी ऊँची ,
कभी नीची इसकी तान,
फिर भी हर पल, 
हर क्षण गा रहा इंसान |

ज़िंदगी एक गुंथी माला……
कभी दर्द,कभी सुकून,
कभी प्रेम ,कभी सम्मान,
रिश्तों में 
फ़ूल और धागे सा बंधा इंसान |

ज़िंदगी यूं ही बहता पानी…………
इसकी रफ़्तार ही इसकी शान,
इसके रूपों की तरह 
पल-पल बदलता जाता इंसान |

ज़िंदगी एक दिल की धड़कन……….
जो ना कभी रुकती,
 मन में चुकी है ठान,
सुनता तो है पर , 
क्यों समझता नहीं इंसान ?

ज़िंदगी एक मीठी नींद……………
बंद आँखों में कट जाती,
खुले तो अस्तित्व का उफ़ान,
जागकर भी 
सोने का ढोंग करता इंसान |

जिंदगी कोई पुराना सामान…………
कभी झाड़कर,कभी पोंछकर,
डालता इसमें जान,
सरकते समय के साथ, 
इसे भी सरका रहा इंसान |

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