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शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

वक़्त नहीं .....

ये यादों के उजाले 
जाने कौन सी उम्मीद लिए 
मेरा दर खटखटा रहे हैं ?
 
जानते है .....
कि मुझमें छाया हुआ है 
"कोहरा"
मसरूफियत का  ,
भागती दौड़ती 
ज़िन्दगी का 

वक़्त ही नहीं ,
कि मैं 
वो अपनापन दे सकूँ 
वही पुराना ,
दीवानापन दे सकूँ 

वजह भी नहीं ,
अब जगह भी नहीं ,
तितलियों सी यादों को 
सजाने के लिए,
सिरहाने में 
बसाने के लिए,
फिर किस्मत 
आज़माने के लिए ,
एक बार फिर 
दूर जाने के लिए







कल्पना पाण्डेय

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