रविवार, 31 जनवरी 2016

माँ.....

"माँ" वो कौन सा समुंदर है 
जहाँ से इतना प्यार लाती है ?

आसमान सा अपना आँचल
सदा मुझ पर ओढ़ाती है

पहले लोरी ,अब तेरी दुआएं
मुझे सुकून से सुलाती है

मेरी इक हार पे तू घंटो
क्यूँ आंसू बहाती है ?

तेरी ममता ही तो
मुझे ढांढस बंधाती है

इन्द्रधनुष का हर रंग तू
मेरी मुट्ठी में चाहती है

तू ही सही ,कभी गलत
का अंतर सिखाती है

हर दुःख ,हर सुख में
ईश्वर संग तू ही याद आती है

तेरे चरणों में हर बार
कल्पना नया वात्सल्य पाती है

सिर्फ .....

" सिर्फ "
दो किरदार ----
"मैं " और "तुम "
रचते हैं मेरा वजूद
लिखते हैं मेरा आज 
बुनते हैं मेरा कल
सिर्फ
"तुम" और "मैं"

ये ख्वाइशें.....

ये ख्वाइशें भी .....पानी सी

"बचपन " में .....द्रव्य सी ,
बह जाती....मासूम सी
उफन जाती ....जिद्द सी

"जवानी " में ....ठोस सी ,
जम जाती ...बर्फ सी
हो जाती.....सख्त सी

" बुढ़ापे " में ......भाप सी ,
उड़ जाती......अदृश्य सी
रह जाती......स्वपन सी

देहलीज़ का दीपक.......


देहलीज़ का दीपक लाना पिया
मैं बाती ,तुम तेल बन जाना पिया

मैं तुझ में कुछ ऐसा भीगूँ
तुम बस मुझ में समाना पिया

दोनों जलकर ख़ाक बने
"मैं "और "तुम" मिटाना पिया

सुख दुःख में हम साथ जलें
ऐसी लौ लगाना पिया

रंगोली सुकून की मैं भर दूं
तुम बस संग मुस्काना पिया

तम जीवन के संग हरें
ऐसी राह दिखाना पिया

इक ऐसा दीपक लाना पिया
मेरी देहलीज़ सजाना पिया

चिराग......


चरागों की लौ नम हो रही
कुछ शोर भी थमने लगा
एक जश्न संग मनाया हमने
अब जहाँ सोने चला

कुछ चिराग उम्मीद के
कुछ संतुष्टि के
कुछ वादों के
कुछ इरादों के
कुछ आशीष के
कुछ प्रेम के
अब तलक सबकी देली में
टिमटिमा रहे
मुस्कुरा रहे
शायद ....
अगली दीपावली तक ऐसे ही मिले
झिलमिलाते हुए
रिश्ते निभाते हुए

पर न जाने क्यों
मन फिर भी व्यथित है
इस त्यौहार के जाने से

मुकम्मल ख्वाइशें.....

तमाम दिन का सफ़र करके
रोज़ रात ये "ख्वाइशें"
इस उम्मीद के साथ 
मेरी "कोशिशों "के साथ
सो जाती हैं ,
की कल का "सूरज "
उन्हें मुकम्मल मुकाम तक
पहुँचाने वाला है
और .......
हैरत इस बात की है कि
जितनी ख्वाइशें बढ़ती हैं ,
कोशिशें उतना ही
मखमली बिस्तर
उनके लिए बिछाती हैं
और सूरज सजा धजा
तैयार खड़ा रहता है
मेरी मुकम्मल ख्वाइशों की
रोशनाई अपने पर मलने को
"अब तो मुस्कुरा कल्पना ".....कहने को

नज़दीकियां

ये ज़मीं भी चाहिए
ये आसमान भी
और
इनकी दूरियां नापने को
तेरी नज़दीकियां भी

मैं अकेला" ....."अकेला मैं "

इतने बरसों में
उसने मेरा हाथ नहीं छोड़ा
सोचा की ........
"मैं अकेला "कहाँ जाऊंगा ?
और
आज इतने बरसों बाद
उसने मेरा हाथ छोड़ दिया
की देखें .......
"अकेला मैं "कहाँ जाऊँगा ?

"गज़ब " है ना हम भी !
"अजब " है ना हम भी !

बरसों में "सच "ही नहीं
"सोच "भी बदल लेते हैं

तखल्लुस......

सुबह से रात गुज़र जाती
इस ज़िन्दगी को "ताकते" हुए
वो भी बाज़ नहीं आती
हर पल मुझे "आंकते" हुए
कौन साहिल ?
कौन है समुंदर ?
"तखल्लुस " टांकना मुश्किल है
कभी वो मुझमें है
कभी मैं उसके अंदर

तुम......

वो तनहा धूप
वहीँ पर समेट कर
वो इश्क वाली
शाल लपेट कर
इन सर्द वादियों
में चले आओ .....तुम
जहाँ दो अँखियाँ
सदियों से
तुम्हारा नाम
धुंध में ढूँढ़ती हैं
कुछ गर्माइश
एहसास की
इनको जरा
ओढाओ ......तुम
कुछ बर्फ हो चला
मुझमें है जो
अपने स्पर्श से
गलाओ...... तुम
आओ
कुछ देर ही सही
इस सर्द मौसम में
मेरा ख्वाब बन जाओ .....तुम
चाहे मुझ में रुक जाओ ......तुम
चाहे मुझमे गुज़र जाओ .......तुम

शब्द और...... रिश्ते

जब "शब्द"अपनी राय खो दें
बचा खुचा अभिप्राय खो दें
अहम - वहम में चोट खाकर 
हर लाज़िमी उपाय खो दें
तो
" रिश्तों " से कहें ......
कुछ समय आराम कीजिये
शब्दों को विराम दीजिये
नयी पहल का लेकर नज़राना
रूठे हुओं को थाम लीजिये

ख़ामोशी में
"शब्द " बड़े तेज़ धड़कते हैं
और वही कहते जाते हैं
जो हम तुम सुनना चाहते हैं
फिर
कोई आहट नहीं
कोई शोर नहीं
शांत से बहते "रिश्ते "
शब्दों की डोर से बंधे

ख्वाइशों की अलमारी......

दिल .......
ये ख्वाइशों की
अलमारी सा

अधूरी ख्वाइशें 
खूंटी में टांग दो

मुकम्मल ख्वाइशें
तेह लगा दो

जिगरी ख्वाइशें
अखबार में दबा दो

बिखरी ख्वाइशें
फूंख मार उडा दो

नयी ख्वाइशें
खानों में लगा दो

पुरानी ख्वाइशें
तिजौरी में सुला दो

मखमली ख्वाइशें
इधर उधर सजा दो

मटमैली ख्वाइशें
दरीचों में घुसा दो

" सफाई " के बाद
दरवाजे पर
कुछ कुरेदा हुआ
पढ़ लो.......
न जगह कम
न वजह कम
न आस काम
न विश्वास कम
न प्रयास कम
न कयास कम
न "हम "कम
न "हमारी ख्वाइशें "कम

इक सवाल.....

सफर पर निकलते वक़्त
"खुदा "ने
बस एक किरदार दिया 
और कुछ लकीरें दी
मसखरा "इंसान "पूछ बैठा
"खुदा "
जब तू तक़दीर
लिख ही सकता था ,
तो "लकीरों "से क्यों ?
"अक्षरों "से लिख लिया होता
" खुदा " मुस्कुराया
और बोला
गर "अक्षरों "में लिखा होता
तो तू पढ़ लेता
हो सकता है ,
मेरी जुबां पकड़ लेता
जो मैं रच चुका
उसमें तू क्या गढ़ लेता ?
फिर
यहाँ कोई नहीं होता
जो मुझे खुदा कहता
इसलिए
" लकीरों "में
नसीब बक्शा है
इसी में तेरे किरदार से
लिपटा एक नक्शा है
अपने हुनर से इन्हें
आकार दिया करना
खुद में रमा रहना
और कहीं भटक जाये
तो पुकार लिया करना

वो मुलाकात......


उस रोज़ "ज़िन्दगी "मिली
सजी धजी
सोलह श्रृंगार किये 
मैंने रास्ता रोक लिया
और सवालों की झड़ी लगा दी ......

सुन !
तू चुपचाप
सीधे चलना कब सीखेगी ?

क्यों भाता है तुझे दोराहे पर खड़ा होना ?
और फिर खोखले रिवाजों के खातिर बड़ा होना

क्यों चाहती है अस्तित्व को परखना ?
और फिर रिस्ते रिश्तों को कांधों पर ढोना

क्यों जरूरी है तेरा हर मोड़ पर मुड़ना ?
और फिर झुकना -गिरना ,बस शून्य होना

क्या सही है मुझे धुंध भरी राह में धकेलना ?
और फिर मुझी से लुक्का - छिप्पी खेलना

कब छोड़ेगी सुख दुख के झूले को पींगे देना ?
और फिर यूँ हवा में टंगा देना

"ज़िन्दगी "निहायत ही कातिलाना अदा से बोली
मेरे "हुज़ूर "
मेरे "हमनवा "
आपको खुबसूरत "शक्ल "दे रही हूँ
इन अनुभवों में पीस के "अक्ल "दे रही हूँ
और
एक मीठे पान की गिलौरी
मेरे होठों पर धर दी

कलम.....

अक्षर अक्षर किताब करती है कलम
पेश ऐसे भी जज़्बात करती है कलम

हुश्न उसका भी कम कबीले गौर नहीं
ख़ामोशी में भी बात करती है कलम

कोरे कागज़ से उम्रों की आशिकी
लफ़्ज़ों की इफरात करती है कलम

संगदिल सनम भी बिखर जाये
जाने क्या खुराफात करती है कलम

इश्क़ भी मुझसे और इश्कियत भी
ज़र्रा ख़याल "क्या बात "करती है कलम

मुफ़लिस हो नहीं सकता हुनर इसका
हर सोच जवाहरात करती है कलम

शख्सियत.....

इक शख्सियत
जबसे ज़ेहन में
उभार ली मैंने
फिर क़तरा क़तरा
उम्र उधार ली मैंने

दिल "तुम ऐसे क्यूँ हो ?.....

उजले कागज़ पर
एहसास
मेरे "खत" होते हैं
दिल के उजले कागज़ पर
मेरी "खता "

"दिल "तुम ऐसे क्यूँ हो ?

मत पूछिये......

हम भी बैठे है ,इंतज़ार में उनके
नए नए खुदा हैं ,पहचान मत पूछिये

ईद होली दीवाली ,आज ही मना लो
पांच साल में ,क्या हो हाल मत पूछिये

इन अश्कों की दास्ताँ भी गज़ब है
पानी में दिल ,कैसे तैरता मत पूछिये

इस मजबूती से बंधा है मेरा वतन
क्या है डोर ,कहाँ है जोड़ ,मत पूछिये

इश्क़ का कलाम ,कुछ पल सूफी हुआ
किस कदर छा गया ,मत पूछिये

मेरा खूबसूरत आज......

बेसाख्ता मुहब्बत है ,उसके नूर पे नाज़ है
ज़िन्दगी का हर दिन ,मेरा खूबसूरत आज है

बहुत सख्त हैं मेरे पैमाने ,मैं बख्शती नहीं
ज़िन्दगी हूँ , सिर्फ तेरे लिए ही लिहाज़ है

संस्कार में लिपटी पतंगें ,क्या खूब रंगत है
ये हमारी बेटियों की ऊंची परवाज़ है

दौलत और कुर्सी भी क्या खूब नशा है
चूहों ने अब तक न छोड़ा डूबता जहाज़ है

मसरूफियत ज़िन्दगी की ,शौक बूढ़ा गए
थकते से हाथों में ,जंग लगा साज़ है

नमक की डली सा मेरा वजूद ,तू पानी है
घुल जाती हूँ तुझमे ,सदियों का रिवाज़ है

मौन......

सबको मृत्युपरांत
दो मिनट का मौन देते हैं
तुम्हें दो साल का मौन दे रखा है 
इससे ज्यादा
कुछ है ही नहीं
हम
लाचारों के पास

इस बुज़दिल ज़मी पर
रहने से बेहतर हुआ
तुम
उस आसमान में खो गयी
कुछ एक के लिए
अब तक
कराह रही हो
बाकि सब के लिए तो
कब की सो गयी .

नारी !

अगर अपने अस्तित्व की
तीन गांठें ......
प्रेम ,
अश्रु व
क्रोध
उचित समय पर "बांधे"
और उचित समय पर "खोले"
तो क्या कुछ जीत नहीं सकती .......नारी

क्या हम सफल हैं?.....


जो कभी था बहुत सफल ,
क्यों यकायक होने लगा है विफल,
ऐसा नहीं की प्रयासों मे कमी सी है,
जाने क्यों रफ्तार मे लिपटी सफलता थमी सी है
शायद ,
हर दिन वही ऊंचाई लांघना,
एक सा आसमान छूना,
सोच और उत्साह को सीमित करना, कथनी करनी का ढर्रा निश्चित करना,
जाँचे परखे विकल्पों को तव्वजो देना,मैं सिर्फ मैं की सुनना,
कामयाबी को पुरानी करने लगता है
सफलता का स्वाद चखते ही ,मनुष्य खुद को भूलने लगता है
अभी-अभी पाई खुशी को धन,यश और अहंकार का मिश्रण बना पीने लगता है,
अपने आप मे रमा - रमा अपने वर्चस्व के साथ अकेले जीने लगता है
पास आती हर वस्तु ,हर इंसान को अपने हिसाब से तोलने –मरोड़ने लगता है
धीरे –धीरे अपनी तय ऊंचाई पर खड़ा ,सफलता पुरानी पड़ते ही खास कहाँ रहता ? आम हो जाता है
उच्च कहाँ रहता ? समतल हो जाता है
ऐसी सफलता टिकती नहीं ,कुछ देर ठिठक कर खड़ी रहती पर ताश के पत्तों की इमारत सी ढह जाती

ढहती सफलता टिकने के लिए हथेली पर राई उगानी पड़ती है
सोच ही नहीं ,राह बदलनी पड़ती है
उम्मीद थाम कर ,मेहनत दुगनी करनी पड़ती है
निरंतर लक्ष्य के साथ साथ ढंग बदलने पड़ते हैं
हालात और इंसान बराबर परखने पड़ते हैं
वक़्त और आत्म संयम को प्राथमिकता देनी पड़ती है
ऐसी आई सफलता ढहती नहीं, बरकरार रहती है
नई बरकरार रहती सफलता का ओज़ बुझता नहीं ,दिव्यदीप सा प्रज्वलित रहता है
हर नई सुबह के साथ ,नई प्रेरणा से ओत-प्रोत,
नए लक्ष्य की चमक सफलता को फिसलने नहीं देती, टिका कर रखती है

सफलता ,
बरकरार सफलता ,
लेकिन सबसे जुदा है स्थायी सफलता
इसे पाते ही टिकाने – ढहने का डर नहीं रहता
ऐसा सफल हर कोई नहीं , सिर्फ कोई कोई होता
बेदाग छवि, नेक ऐसा चरित्रवान होता
परोपकार और परमार्थ ही एकमात्र ध्येय होता
स्थायी सफलता का कार्य क्षेत्र मानवता और मानव से जुडा मन होता
ऐसी – वैसी कामयाबी तो सबके हिस्से की सब को मिलती
लेकिन सफलता स्थायी रखने की क़ुव्वत हर किसी मे कहाँ होती ?

सम होकर , उच्च बनना ...... जरूर कुछ अलग बात होती
लेकिन उच्च होकर सम मे विलीन हो जाना ,उसे आसमान दिखाना......... ये सबकी आस नहीं होती
सबके बस की बात नहीं होती

ये स्मृतियाँ.........

....

ये स्मृतियाँ ....

जब कभी रुक कर पीछे देखती हूँ
स्मृतियों का एक समुन्द्र दिखता है
मेरे रुकते ही ....
वहीँ रुक कर
हिलोरे खाने लगता है

ये स्मृतियाँ ....
कभी मेरे चट्टान होने का बिम्ब देती हैं
कभी रेत में त्रुटियाँ उकेर प्रतिबिम्ब देती हैं
कभी सीप में मोती सी सफलता दिखा देती हैं
कभी गोल घिसे पत्थरों सा अहम् बिछा देती हैं

कुछ स्मृतियाँ
"मगर "सा मुंह खोले हुए उत्तर के इंतज़ार में हैं
कुछ समुंद्री पौंधों की तरह "तृप्त "बस प्यार में हैं
कुछ बार बार जाल में फंसने को तैयार हैं
कुछ जहाज़ के लंगर की तरह मुझमें बेकार हैं

कुछ स्मृतियाँ
रोज़ ढलते सूरज की गोद में पसर कर सो जाती
कुछ जो समुंद्री बादल की तरह बस खो जाती
कुछ उड़ती मछलियों सी उठकर गिर जाती
कुछ एक सुनामी जो यदा कदा भिड जाती

अनगिनत रूप
अनगिनत नाम
अनगिनत किरदारों को ओढ़ती ये स्मृतियाँ
मेरे साथ चलती हैं
सिर्फ मुझसे बोलती हैं
मुझमें रहती हैं

अथक
अनवरत
अविराम
क्यूंकि
"मैं " इन स्मृतियों की सृजक हूँ
और शायद
पोषक भी

मैं तो "कल्पना "हूँ.......

बोझिल मन
जब बंट नहीं पाता
दुविधा का रास्ता
पट नहीं पाता
कहा - अनकहा 
सब व्यर्थ सा
निर्जीव शब्दों के
अर्थ सा

जी करता है
"झील "हो जाऊं
उलझन अपनी
तेह में छुपाऊँ
अपनी काई
संयम से हटाऊँ
कुछ घुटन
किनारे लगाऊँ
बस शांत हो जाऊं

पर
मैं तो "कल्पना "हूँ
आने वाले कल का
अद्भुत सपना हूँ
आँखों में
"समुंदर " लिए फिरती हूँ
अपने हिस्से की
ख़ुशी लिए मचलती हूँ

चुटकी में
मैं "नदी "हो जाती हूँ
"झील "वाला
चेहरा पोंछ आती हूँ
नैनों में आस लिए
होठों में मुस्कान लिए
पथरीले हो या कंटीले
हर पल को जीने के लिए

" झील "वाली काई किनारे लिए
" नदी "वाली जिद्द भीतर लिए
" समुंदर "वाली चाह अपने लिए

आखरी फरमाइश.....

या खुदा ......
अब कुछ पल
मुझे ऐसी जगह ले चल
जहाँ मैं और सिर्फ मेरी परछाई हो 
अब मुझे वो ज़मी बक्श
जहाँ ना मेरी जान पे बन आयी हो

भूल जाने दे वो जन्म मेरा
जो मैं जी के आयी हूँ
स्त्री होने का जहर
जो मैं कुछ देर पहले
पी के आयी हूँ

अभी अभी ....
"मैं "और .....मेरे अपने
अपने और ......सपने
सपने और .....हकीकत
हकीकत और ......सोच
सोच और .......रिवाज़
रिवाज़ और .....रवायतें
रवायतें और .....दर्द
दर्द और ......फिर वही "मैं "
ये "परिधि "
पूरी करके आयी हूँ
बेहद टूट कर आयी हूँ
क़तरा क़तरा नुच के आयी हूँ

दवा नहीं है मेरे जख्मों की
मुझ पर तू दुआ रख दे
मेरा वजूद कोई छू न सके
अगले जनम में वो हक़ दे

अब मुझे बस सो जाने दे
अपनी पनाहों में खो जाने दे
जागी हूँ उम्र भर इस चैन के लिए
किसी दूसरी दुनिया का हो जाने दे

आज की तारीख..

आज की तारीख ही अपशगुनी है
या अपने माथे पे
इक कलंक लगाने का 
ठेका ले कर जन्मी है ?

ऐसा तो नहीं की
दहशत
और
दहशतगर्दों को
मुहब्बत हो गयी है
इस काले दिन से

ये जो चीत्कार से उगा था
पिछले साल
और अस्त हुआ
इस साल
उससे भी कई गुना
दुगनी चीखों ,
चीत्कारों ,
पुकारों
और कलेजे को
चीर देने वाली
इस कायरता पूर्ण
कृत्य के साथ

सो नहीं पायेगी
ये तारीख चैन से ,
श्रापित सी हो गयी है
कभी निर्भया .....चीखेगी
तो कभी मासूम जानें
दागेंगी गोलियां
उन हैवानों पर
उनकी नपुंसक सोच पर
ये तारीख हर साल
शर्मसार होगी
ज़ार ज़ार रोयेगी .

दरार....


ये बेहद नज़दीकियां
रिश्तों में
बस इक “दरार” की सी
जगह छोड़ देती है
जिसमें 
आह……परवाह
अहम् ….. वहम
शिकवे ……गीले
शौक …..आदत
जिद्द……. ख्वाब
सुकून…… जूनून
मसरूफियत …… हैसियत
इतना कुछ भर जाता है कि
“इश्क काफूर ”
हुआ सा लगता है
मुहब्बत के जगह जगह
पैबंद लगने लगते हैं
और ये दरार
ढांक दी जाती है
“हम – तुम “तब भी बंधे रहते हैं
रोज़मर्रा की तरह
तू मुझमें समाया सा “बस”
और मैं तुझमें बसी सी “बस”

फिर …….
ये कुछ पल की दूरियां
हमें कुछ आभास दिलाती हैं
“तेरे – तुम” की चाहत
“मेरे – मैं” को बहुत याद आती है
खुले आसमान की भांति
अपार जगह लिए हुए
इन दूरियों में
“दरार वाला सब”
बिखर जाता है
सब बेमायने हो जाता है
तब पैबंद नहीं रहती मुहब्बत
इक मखमली कालीन सी
बिछ जाती है
जहाँ “मैं और तुम ”
इक बार फिर लोट लोट कर
तर – बतर हो जाते हैं पुराने वाले
अपने नए नवेले से रिश्ते से
वही पुरानी सी कशिश लिए
एक कसक से सरोबार
सच है
दूरियां पास लाती है
बहुत पास

फिर कायम हो जाती हैं
बेहद नजदीकियां
जो नीव है तेरे मेरे सम्मान की
हमारे रिश्ते के एहतराम की

स्त्री" हूँ .......

 

"स्त्री" हूँ .......
आसपास के कालेपन की गवाह भी 
और इस दोगलेपन से तबाह भी
चाहती तो थी .....
उजली किरणों को 
हथेलियों में भर लूं 
खुद पर 
कुछ उजास मल लूं 
पर लड़े बिना जीतना 
मेरे हक़ में नहीं
और शायद
 रक्त में भी नहीं

लकीरों में 
"ज्ञान का चन्द्रमा"
खरोंच लिया है मैंने 
इक आस लिए 
सौ प्रयास लिए
 वादा है 
मेरा खुद से 
और इस ज़माने से भी ......
फटकने नहीं दूंगी 
अंधियारा अपने अंश तक 
"बिटिया को सूरज " सा ढब दूँगी  
रंगों भरी कूची अजब दूँगी 
 की रंग दे वो 
मेरा काला अतीत 
कदाचित ही 
पर अपना भविष्य 
निश्चित ही

कल्पना पाण्डेय

वो कहते हैं ...

 वो कहते हैं ...
 परखना मत ,
 परखने से कोई अपना नहीं रहता   
 ये भी सच है की
  परख लो तो ,
 कभी अपनी ,
 कभी एक दूसरे की नजरों में 
 गिरने का डर नहीं रहता 

ज़िंदगी का सा रे गा मा ……………


ज़िंदगी एक साज़…
सुर लग जाये सही ,
तो क्षितिज छू ले इंसान ।

ज़िंदगी एक मुट्ढ़ी रेत……….
बंध जाये, 
तो ऊँची उड़ान
फ़िसल जाये ,
तो हार जाता इंसान |

ज़िंदगी एक सुरीला गान…….
कभी ऊँची ,
कभी नीची इसकी तान,
फिर भी हर पल, 
हर क्षण गा रहा इंसान |

ज़िंदगी एक गुंथी माला……
कभी दर्द,कभी सुकून,
कभी प्रेम ,कभी सम्मान,
रिश्तों में 
फ़ूल और धागे सा बंधा इंसान |

ज़िंदगी यूं ही बहता पानी…………
इसकी रफ़्तार ही इसकी शान,
इसके रूपों की तरह 
पल-पल बदलता जाता इंसान |

ज़िंदगी एक दिल की धड़कन……….
जो ना कभी रुकती,
 मन में चुकी है ठान,
सुनता तो है पर , 
क्यों समझता नहीं इंसान ?

ज़िंदगी एक मीठी नींद……………
बंद आँखों में कट जाती,
खुले तो अस्तित्व का उफ़ान,
जागकर भी 
सोने का ढोंग करता इंसान |

जिंदगी कोई पुराना सामान…………
कभी झाड़कर,कभी पोंछकर,
डालता इसमें जान,
सरकते समय के साथ, 
इसे भी सरका रहा इंसान |

कुछ कर दिखाओ.......


किस शाख पर टंगा है 
 खुशहाली का सपना
 तेरा मेरा नहीं 
 हम सब का अपना 
 उस साख को हिलाओ 
 पत्तों पर पड़ी बूंदों को 
 हथेली पर जमाओ 
 हर ओस को 
 आस बनाओ 
 हर आस को 
 विश्वाश बनाओ

किस अर्श पर खीचीं हैं 
उमीदों की तरंगे  
तेरी मेरी नहीं 
हम सबकी उमंगें 
इन तरंगों को 
इकठा कर लाओ 
अद्भुत सी इक 
धुन बनाओ
साज़ ना सही 
संग ही गाओ 
आज  नया 
इक राग बनाओ 

बहुत उदास हो जाती हूँ ......

जब कभी मेरे शब्द
दूसरों तक पहुँचने से पहले ही
ग़लतफ़हमी के
बादलों को पार करते हुए
जख्मी हो जाते हैं
अपना प्रारूप खो देते हैं
और उन तक जो पहुँच पाता है
वो......
मेरी सोच ,
मेरे व्यक्तित्व के बिलकुल परे
प्रतीत होता है
मेरी कल्पना सेदूर
शायद .....
बहुत ही दूर

पुराना होने का दुःख.....



आज मन कुछ ढूंढ़ रहा है,जाने क्या गुम खोज रहा है ?
ऐसा कुछ जो अनजाना सा,ना जाना पर पहचाना सा

सुनी नजरे,खाली मन ,यहाँ वहां ,कभी इधर उधर
देख पुराने कमरे को ,जम गयी उस पर मेरी नज़र

घुप्प अँधेरा तन्हाई भरा ,सूना -सूना ,मरा -मरा
हलके हलके, जरा -जरा , कोई बोला डरा -डरा

आई हो तो चिटखन खोलो,कोई न लेता तुम सुध ले लो
हममे भी थी कभी कुछ बात ,अगर न पड़ती वक़्त की लात

हाथ बढाकर चिटखन खोली, रखी चीज़ें कुछ न बोली
धूल भरी जब आँखें खोली, मुस्काई वे हौली -हौली

अलमारी में थी बंद घडी ,हाथ लगाते बोल पड़ी
अच्छा-बुरा समय है बीता, कुछ-कुछ हारा ,बहुत कुछ जीता
हार जीत मुट्ठी में बांधे
पकड़े -पकडे थक गयी हूँ ,थक गयी ,तो रुक गयी हूँ

अलमारी में उलटी पड़ी एक लालटेन ,
उजाले को हाथ देती ,अँधेरे को गले लगाती थी लालटेन,
कराह कर टूटे कांच में से बोली
जिंदगी गुजार दी अंधेरों को पोछते हुए ,आज खुद हूँ अँधेरे से लिपटे हुए

अलमारी में दिखा एक चटका आइना ,
अपनी दरार से उभर कर ,बोला वह आइना ,
रंग और रूप ही नहीं ,आत्मा को मुझ में देखा है
अब कुरूप हो गया मन,बिक गयी आत्मा,तभी तो टुटा हुआ मुझे यहाँ फैंका है

अलमारी मे थे कुछ ताश के पत्ते ,
अपने साथियों से बिछुड़े ,आधे अधूरे पत्ते ,
कभी जीते ,कभी हारे ,जब जब बिछे ये पत्ते
जुऐ में जीत कर साथी खो दिए, जिंदगी में हार कर रिश्ते खो दिए

अलमारी में दिखा मुड़ा-तुड़ा कागज़ का टुकड़ा
चिट्ठी थी शायद,लिखा था दिल का दुखड़ा
पीले पड़े कागज़ पर,स्याही भी धुल गयी थी
धुंधले शब्दों में जिसके नाम की चिट्ठी थी ,वो कब की चिर निंद्रा में सो गयी थी

अलमारी में पड़े थे कुछ सिक्के
कभी हाथ बदलते थे ,अब खारिज हो चुके ये सिक्के
खन -खन बोले मायूस हताश
नए का स्वागत ,पुराने की गत्त ऐसी ,इंसानी फितरत ही ऐसी

अलमारी के कोने में ख़ड़ी थी एक कलम ,
घिसी हुई,टूटी बुदबुदाई कलम,
पुरानी हूँ ,पर आज भी मुझ में बहुत है दम ,
लिखूं क्या ? भावना -जज़्बात हैं नहीं ,अलफ़ाज़ भी हो गए है कम

अलमारी के दाएँ तरफ़ पड़ा था चश्मा ,
मोटे से फ्रेम वाला ,खरोंचों से भरा चश्मा ,
बोला शीशा मलते मलते
अच्छे -बुरे लोग दिखें हैं चलते- चलते ,
नज़र का धोखा है,
अच्छाई भी चलती है ,बुराई के साथ गले मिलते -मिलते

अलमारी में तमाम चीजें थी धूल में पड़ी
सब पर पुराने और बेकार होने की लानत पड़ी
आंसू से मैं पोंछ रही थी
ये क्या ढूंढा ? सोच रही थी
नया -पुराना, आना -जाना ,
जिन्दगी गाती अजब तराना
नया है तो नवीन, नवीन है तो पुरस्कृत ,
पुराना है तो प्राचीन ,प्राचीन है तो तिरस्कृत ,
समय का पहियाँ नापता यहाँ हर तोल
नया है तो अनमोल,पुराना है तो बेकार-बेमोल

यात्रा

प्रेम सबसे कम समय में तय की हुई सबसे लंबी दूरी है... यात्रा भी मैं ... यात्री भी मैं