बुधवार, 30 नवंबर 2016

हिमाकत

मुझसे इश्क़ की हिमाकत ना कीजिये
मैं शब्द हूँ..... तुम्हें छिपा नहीं पाऊँगी
ज़ाहिर भी कर दूंगी तुमको
और दिखा भी नहीं पाऊँगी

पन्ना

तुम्हें ढूँढना क्या मुश्किल है ?

मेरी डायरी का कोई भी पन्ना खटखटाकर देख लो

ग़ज़ल

मुझे देखना..... जितना आसान है 
पढ़ना...... उतना ही मुश्किल 
उस रोज़ .....यूँ ही मैं शब्दों से कह बैठी 

रात महफ़िल में इक ही ग़ज़ल परवान चढ़ी ....
इश्क़ की दास्तां है प्यारे ......
अपनी अपनी जुबां है प्यारे .......

और .....
मैं अपने शब्दों को निहारती रही
शब्द मुझसे बुदबुदाते रहे

मेरी बिंदिया

पहले ......वक़्त रोक दिया करते थे दरमियां 
अबके मिले तो .......उम्र रोक कर रख दी 
मेरी बिंदिया आज भी ....सुर्ख ही भाती है ना तुम्हें ?

बेफिक्री

मेरी इस बेफिक्री का .....
ना तो लहज़ा है ...ना ही ज़ायका 
जाने क्यों....... लोग मुझे ग़ज़ल कहते हैं ?

प्रेम

नज़दीकियों और दूरियों के दरमियाँ 
"जगह" का कोई किरदार नहीं होता 
बस ....इक "वजह" होती है 
जो बेबाक बोलती हुई 
प्रेम को
स्थापित....... विस्थापित .... पुनर्स्थापित
करती रहती है
बड़ी ख़ामोशी से .....

"शिद्दत" .....

मेरा नाम आखिरी में ....धुंधला
पर.... तुम हर बार ....पुरज़ोर दिखो

"शिद्दत" .....
कुछ इस कायदे से रखना चाहूंगी कागज़ पर 

उम्र

उम्र को शब्दों से बाँध लेती हूँ......
इस लिए ज़रा...... सरकती कम है 

"शहर शब्दों का"

इक पूरा "शहर शब्दों का" सांस लेने लगता है
उस पल ....जब हम तुम संग ज़िंदा से लगते हैं


जुगनू तितली का सच

तुमने मेरा रंग ओढ़ा
और
मैंने तुम्हारी रौशनी पहन ली
रस्म थी शायद ....आखरी मुलाक़ात वाली

जुगनू तितली का सच गढ़ा है .....
देखो कुछ समझ आये तो .... मेरे इश्क़ सा


फर्क

आस पास
और
करीब का फर्क ?

इक अनचाहा ......इक मनचाहा...... बस


बाँवरी नदी

एक ही समुन्दर में ताउम्र कौन पैर डाले बैठा रहता है .........
कोई मेरी तरह ही बाँवरी नदी होगी 

ग़ज़ल

मिसरा मिसरा नहीं....
आज... क़तरा क़तरा है ग़ज़ल
सुना है ......किसी ने गिरहों का श्रृंगार किया है

आज "ग़ज़ल" सुनियेगा नहीं .....
सिर्फ देखिएगा

लम्हे...

कुछ लम्हे..... पथराए हुए भी रोज़ जीते हैं मुझमें
छू के देखिये ....मेरी डायरी की नब्ज़ चल रही
इन शब्दों में ......गर्माइश भी है अभी


तम

सोचती हूँ ....दिया क्या जलाऊँ ?
मेरा वजूद काफी होगा.......
तुम्हारा हर "तम" हरने के लिए

दीपक

जी तो बहुत था चाँद ....
तुम्हारी ड्योढ़ी पर भी इक दीपक रख आती 
अपना नाम लिख आती 
पर .... तुम हो की मेरी ही देहलीज़ पर कंदील टांग रहे 
अब ऐसा भी क्या फ़िदा होना...? 
I mean....ऐसा भी क्या रोशन होना

मोती

मेरी इस दुनिया ....
और
तुम्हारी उस दुनिया...... का फासला
अब क़दमों से तय नहीं हो पायेगा ....
चलो .......इन शब्दों की बयार बहा दूं .....
पाती पर ......कुछ मोती तुम्हारे नाम के उगा दूं

बस सामना ही नहीं होता

तुमसे मिलती तो रोज़ ही हूँ......बस सामना ही नहीं होता

कागज़

इन आँखों ने ......ताउम्र इक इंतज़ार जिया है
इन होठों ने ........ताउम्र इक इज़हार सिया है
शायद कागज़ पर

वक़्त

मेरे हिस्से का वक़्त कहाँ रखते हो ?
देखो तो सही ......
इक समुन्दर उग आया होगा वहां

चाँद

चाँद खोता .....तो मिल भी जाता
तुम तो जुदा हो गए
चाँद भी ना हुए मेरे .....और
खुदा भी हो गए

इत्र

इस फेर आओ तो ....
अपना समंदर वाला इत्र साथ लेते आना 
वो आ आ कर जाने वाली
जा जा कर आने वाली.... महक चाहिए थी 
इश्क़ का लिबास.....इक दफ़ा मैं भी तो पहनूँ 
थोड़ा समंदर .......मैं भी तो हो लूँ
वो इत्र .......मैं भी तो जी लूँ

.वजूद

बिंदिया से बिछिया तक ......
सब में तुम्हारी परछाई क़ुबूल है 
बस.....वजूद में खुद को देखती हूँ
वर्ना ये जीना भी तो फ़िज़ूल है

परिचय

बेशक किरदार बदलना मेरी फितरत है ....
पर .....
ये मेरे माथे का सूरज मेरा सटीक परिचय है

अर्थ

मैं खुद में इक संपूर्ण वाक्य सी हूं ........इक अर्थ लिए 
शब्द शब्द परखोगे तो फिरोगे मुझे व्यर्थ लिए

सुनो चाँद .....

अँधेरे की सुगबुगाहट में ....
तुम्हारा इक धेला भर होना ही ....
मुझे जलाकर राख कर देता है 
सुनो चाँद .....
तुम.... कभी मत बदलना

अक्षर ..

अक्सर सोचती हूँ तुम्हारा नाम लिख दूं .....
उफ्फ.......इन अक्षरों में उलझ जाती हूँ 
उलझी उलझी इन अक्षरों संग सो जाती हूँ ....
ख्वाबों में ये अक्षर ....
खुद ब खुद सुलझ जाते हैं 
मेरे हो जाते हैं

रात

रोज़.... इस रात को निगलता है चाँद 
और ....
उसी चाँद को निगलकर मैं .....रात हो जाती हूँ

सृजन

मैं शब्दों से कहीं ज्यादा हूँ .... 
इक बार सृजन करके देखो मुझे 
ज़िन्दगी और ज़िन्दगानी में फ़र्क बूझ पाओगे

कागज़...

टूटी हुई चीज़ों को पन्नों में संजोने का शौक है मुझे 
तभी तो ...
कितनी बार कुरेदा है तुम्हें 
ना जाने कितनी बार बोया है 
मेरा कागज़.... यूँ ही नहीं लशकारे मारता

इश्किया अदब

है नहीं .....पर लगता है ......है अभी
है भी अभी..... और लगता भी नहीं 
इश्किया अदब ... मुबारक मेरे लफ़्ज़ों !

अँधेरा

कुछ तहखानों में चाह कर भी अँधेरा भरा नहीं जा सकता 
यकीन न आये तो चले आओ मुझमें....
मेरे शब्दों का पीछा करते हुए .....
मध्यम आंच में चाँद सुलगा रखा है

मेरे शब्द

मुट्ठी में ही चिपके रह गए आज मेरे शब्द 
आज तुम्हें मेरी सुरीली अँखियों ने लिखा 
जाने कहाँ.......... जाने कब तलक

अनलिखी कल्पना

अम्बार भी लगा दूं गर शब्दों का तुम्हारे आगे ....
तुम लिख न पाओगे मुझे 
अनलिखी कल्पना जो हूँ तुम्हारी 
हमेशा अनलिखी ही रहूंगी ..

"सुनो"...."कहो"

तुम्हारी...... "सुनो" का अंत नहीं था .....
इसीलिए ......मेरा "कहो" भी अनंत हो चला
मैं ......"सुनो" कहना ही भूल गयी
तुमने भी ......"कहो" कहना बिसरा दिया

"दिलरुबा"

लाओ ....कुछ चाख रफ़ू किये देती हूँ 
ज़िन्दगी...... पैबंदों में "दिलरुबा" नहीं लगती

कवायद

इसे बस इक इत्तेफ़ाक़ ही समझियेगा.... कि आप चले आये 
वर्ना.....
यहाँ कवायद तो मेरी ख्वाइशों की हो रही थी

"सिफर "

तुम्हारे लिए "सिफर " होंगी......
पर खुद के लिए "सफर" बन गयी हूँ
दिन में .....चाँद बनकर
रात में ....सूरज बनकर
रुक रुक कर चलने वाला नहीं 
ठिठक ठिठक कर गुजरने वाला
बदल लिया है खुद को
जाने कौन सी हद तलक
उस सिफर से होते हुए....... इस सफर तलक
अब .....रात में सूरजमुखी हूँ
और
दिन में रात रानी भी
और इन दोनों के बीच ......ना जाने क्या क्या
कभी यूँ ही ...... किसी रोज़
इस दिन की चमक
उस रात की दमक
हटा कर देखना
मेरे चाँद से माथे पर सूरज उगा मिलेगा
अगर मुझे बूझ पाए तो..... ठीक
अगर मुझे देख पाए तो ......ठीक
वर्ना हो सकता है .....
तुम्हें सिफर पर इक और सिफर लगा मिलेगा
उम्र "
अक्सर शब्दों के रास्ते में .....रोड़ा हो जाती है
कई बार....... वो ......
कड़वा सच लिखने नहीं देती
और.....वो मीठा झूठ पढ़ने नहीं देती
रुके रुके शब्दों की अधूरी दास्तां सी.....
ये जो देख पाते हैं वो ...
या तो उम्र लांघ देते हैं
या .......शब्दों के पार चले जाते हैं
बयां हर हाल में करते हैं खुद को
क्योंकि.....
सच को सच्चा लिखा जाना जरुरी है
चाहे मुट्ठी भर पन्नों में ही सही
यही असली हुनर है
फिर उम्र चाहे कितनी बगावत करती रहे ........
कुछ शब्द मासूम ही खूबसूरत लगते हैं .....
तो फिर चलो ......
कह देते हैं इक बार फिर.....वही
लिख देते हैं.... इक बार फिर ......वही
उम्र के परे.....
शब्द के उस पार से इस पर तक
और बीच में भी ..... हर कहीं

"तुम"

तुम मेरे लिए रेत क्यों हुए........ पहाड़ क्यों न हुए ?
तुम मेरे लिए पहाड़ क्यों हुए....... रेत क्यों न हुए ?
रेत ...पहाड़... मैं.....सब वही 
सिर्फ..... "तुम" बदल गया
पहली बार भी
और
फिर..... आखिरी बार भी

इंतज़ार

सच कहा आपने ....
किसी के पास इतना वक़्त नहीं है कि वो इंतज़ार में बना रहे। 
पर मेरे पास शब्द हैं.......
मैं उन्हें इज़हार में तो बनाये रख सकती हूँ .....आज भी 
मेरे शब्दों के पास वक़्त ही वक़्त है 
उनका इंतज़ार मुकम्मल रहेगा.....
रहेगा ना.....?

हुनर



बिना बदले ......तराशने का हुनर
सिर्फ ....
लफ्ज़ और इश्क़ के हिस्से में आया है

वजह

मेरे ख़ास होने की महज़ इतनी सी वजह काफी है .....
कि तुम आज भी मुझे ......
इन शब्दों में खोजते हो .... यादों में नहीं .......
जो वक़्त की गिरफ्त में हुआ करती हैं
और मैं तो .....बेमौसम...... बेवक्त 
तब भी हुआ करती थी और..... आज भी हूँ

जब कहीं नहीं जा पाती हूँ ....

जब कहीं नहीं जा पाती हूँ ....
तो खुद में बहुत दूर निकल जाती हूँ 
मलहम ना भी मिले 
मखमल तो मिल ही जाता है अपने आप का
अभी अभी अजनबी हुआ हुआ "मैं" .....
इक बार फिर सुर्ख गुलाब देकर
जाने कितनी बार I love u बोलता जाता है ....
और मैं बाँवरी ....I am sorry सुन रही होती हूँ ... 

इसलिए.... लौटा लाती हूँ खुद को
वापस वहीँ ......
जहाँ से फिर न जाने कितनी बार
कहीं नहीं जा पाना तय है मेरा

.बागबाँ

अजनबी ......बागबाँ हुआ जा रहा 
आँखों का कत्थई होना लाज़मी है ....

शोर

थिरकन लकीरों में लिवा लायी थी 
इसलिए आज घुँघरुओं में रेत भर ली 
कुछ तो शोर कम हो हथेलियों का

ज़िन्दगी.......

ज़िन्दगी....... 
जब भी शिकायतों से भरती जाती है 
साँसों से खाली होती जाती है

मौसम



थोड़ी धुंध...
ज़रा सी धूप...
इत्तु सी चांदनी......पड़ी रहने दो मुझ पर
तुम्हारा मौसम बना रहता है

शब्द

मेरे सन्नाटों को पढ़ने के लिए तुम्हें मेरे शब्दों से गुज़रना होगा .... 
बिना आवाज़ वाले शब्द ज़रा गहरे गढ़े हुए होंगे.....

बेरंग..

रंगों की दीवानगी थी ....
तो सोचा...... तुम्हें ही अंतस में धर लिया जाय
क्या जानती थी तुम असमानी हो जाओगे 
बेरंग........चुटकियों वाला धनुक

गुमशुदा

फिर कुछ यूँ हुआ.......... कि "तुम" हो गए 
शब्द - शब्द....... कहानी होता चला गया 
और "मैं".....उन कहानियों में गुमशुदा हो गयी

शब्द और खामोशियाँ

बोलो ....किस पर इलज़ाम लगाऊं ?
खुद पर
या ...इन शब्दों पर
या फिर... उन खामोशियों पर 
जो तुम रख कर जा रहे हो 
मुझे आदत है तुम्हारी
और ......
ये शब्द और खामोशियाँ आदी हैं मेरी
सब तुम्हारी वजह से थम गया
इतनी सारी जगह उग आई है यहाँ
अब इसमें क्या भरूं ....
शब्दों का सन्नाटा
या .....खामोशियों की गूँज

"कल्पना"

सोच रही.....
इक बार खुद को फिर से शुरू करके देखूं
आदि से अंत तक सिर्फ "कल्पना" होकर देखूं

अद्भुत ...अद्वितीय

मैं ....
इक ऐसा प्रश्न हूँ जिसके हिस्से में सवाल ही सवाल हैं
और
ऐसा उत्तर हूँ जिसके हल में सिफर ही सिफर
प्रश्न ....उत्तर
सवाल .....हल
और मैं ....मैं .....अद्भुत ...अद्वितीय

तलब .

तलब ......तीन अक्षरों का शब्द
अमूमन दो अक्षरों से शांत हो जाता है ..."तुम"

किताब

अनलिखा पढ़ने का हुनर रखते तो ...
मैं किताब ना हुई होती

शब्द



ऐसी कई कविताएं मैं अक्सर बहा देती हूँ जो मुझसे
तुम्हारे हिस्से के शब्द मांगती हैं

सोमवार, 10 अक्तूबर 2016

मुड़ा हुआ पन्ना......

तुम मेरी कहानी का वो मुड़ा हुआ पन्ना हो जो चल रहा है मेरे साथ ।
ज़रा ज़रा पीला हुआ है ,पर मुझे तो अपने साथ सुफेद होता दिख रहा । शायद बुढा रहा है मेरे साथ ।
तुम कभी इत्तेफाक हो ही नहीं सकते मेरी कहानी में
तुम इक सोची समझी साजिश हो जिसमें इश्क़ ने मुझे चुना और मैं तुम पर फ़िदा हो गयी ।
अब कहानी अगर आगे चले नहीं तो बिखर जायेगी ।
इसलिए जब तक मैं हूँ ......
तुम्हारा मुड़ा पन्ना मेरा all time favourite रहेगा ।
  तो बस चलते रहो मुझमें .....

ख़ुशी....

जब मैं खुश होती हूँ,
तो इश्क़ लिखती हूँ 
और जब बहुत खुश होती हूँ
तो इश्क़ उकेरता है मुझे
इश्क़ तो शब्दों को हुआ है
मेरा क्या ......
मैं तो बस लिखती जाती हूँ
ख़ुशी - ख़ुशी

हिमाकत....

मुझसे  इश्क़ की हिमाकत ना कीजिये
मैं शब्द हूँ.....  तुम्हें छिपा नहीं पाऊँगी
ज़ाहिर भी कर दूंगी तुमको
और दिखा भी नहीं पाऊँगी

तसल्ली रखियेगा....

तसल्ली रखियेगा....
  मेरे मोह मोह के धागों में आप बंधे रहेंगे
  कभी ख्वाइश से
  कभी गिरह बनकर
इश्क़ भी उगता रहेगा
बस..... शब्द नहीं होंगे
मैं अपने ढाई आखर इन धागों में पिरो लिया करुँगी
प्रेम के  नहीं .... शब्द  के
अब से  तुम्हारे लिए ......नहीं सिर्फ अपने लिए
तसल्ली रखियेगा.....
   मेरे मोह मोह के धागों में आप बंधे रहेंगे
   कभी ख्वाइश से
   कभी गिरह बनकर

मैं होंगी ज़रा पागल ... मैंने तुमको है चुना

तुम" तक भी शायद "मैं "ही अकेली चल कर आयी थी
अब  ....
"आप "से भी वापसी  "मैं "खुद ही तय कर लूंगी
चटकी हूँ........ बिखरी नहीं हूँ मैं

मैं होंगी ज़रा पागल ... मैंने तुमको है चुना

मोहर.....

ज़रा सी खुद की कद्र क्या कर ली मैंने ...
कोई नाराज़ हो गया
कुछ  रिवाज़ हो गया
मुझे रसीदी टिकट नहीं चाहिए .... तुमसे
मैं खुद -बखुद इक मोहर हूँ

आदत....

मेरी कहानी के पहले शब्द से आखिरी शब्द तक
और फिर .....
उस पूर्णविराम के बाद भी
कई कोसों दूर तक.......
  कोई किरदार नहीं दिखता......... सिवाय तुम्हारे

आदत इसे कहते हैं ......

काश....

दिन भर मैं शब्दों में खूबसूरती ढूंढती हूँ .....
तुम्हारी तलाश मुझमें ख़त्म होती है
रात तक मेरे शब्द कहर ढाते दिखते हैं.......
काश ....
खूबसूरती लिखी जा सकती

वादा....

जब भी कुछ लिखती हूँ .....
तो तुम बला के खूबसूरत नज़र आते हो
और ....
वही अपना लिखा हुआ जब तुमसे सुनती हूँ ....
गज़ब खूबसूरत हो जाती हूँ मैं

वादा लिखे जाने का
या .....सुनाये जाने का नहीं है
वादा खूबसूरती का है ....मेरे शब्दों से
मुझसे
तुमसे
बस रह जाने का है.... खूबसूरत
हर बार .......बार बार
मुझमें
तुम में
हम में

औरत....

दिन के उठने से कई घंटों पहले....
अपना सूरज उगा लेती हो 
और देर रात तक.....
इन तारों को बुहारती रहती हो

ज़िन्दगी.......
तुम भी "औरत"  हुए जा रही हो

अंतर.....

अंतर है ....
तुम खुले दरवाज़ों में भी दस्तक नहीं देते
मैं बंद दरवाज़ों पर भी अपनी अर्जी धर आती हूँ

फ़ासले.....

कुछ फ़ासले तय नहीं किये जाते ....
बस रख दिए जाते हैं दरमियां
"खलिश" और "खला"जैसे शब्द रोपने के लिए
  इस पार से उस पार की दूरी खुद सोखने के लिए

बहाल.....

जब तलक तुम मेरे शब्दों में रहोगे ....
मैं बहाल रहूंगी

आयत....

और क्या है मेरे पास .....
इन शब्दों की आयत है .....तुम्हारे नाम वाली
यही रख लो

रूह.....

ऐ इश्क़ ......
मेरे लफ़्ज़ों में रूह भरने का शुक्रिया
😊😊😊😊😊

आज इससे बेहतर लिखने का मन नहीं .....😊😊😊😊😊

लफ्ज़.....

मेरे वो सारे लफ्ज़ "पुरुष" हैं ....जो इबादत करते हैं
और .....
वो सारे शब्द "स्त्री" .......जो क़ुबूल करते हैं
फिर चाहे..... वो ज़िन्दगी की नज़्म हो
या फिर ......इश्क़ की ग़ज़ल

रेशमी सदी ...

याद है .....
इस मोड से उस मोड़ तक
हमने इक सदी ठहरा रखी थी ....
जो आज भी .... सिर्फ  तुम्हें दिखती है
और ....सिर्फ मुझे महसूस होती है

इस मोड़ से उस मोड़ तक ....
इक रेशमी सदी ...
हम तुम ....संग संग .....आज भी .....अब तलक

शोर.....

बस अभी लौटे हैं महफ़िल से मेरे शब्द ....
आते ही बोले ....कल्पना !
हमें तालियों की गड़गड़ाहट नहीं 
मौन रूहों को आहट सुना दिया करो

शोर में जी घबराता है

याद....

इक याद चली है मुझसे .....
             कई साल पिरोये हुए
कितना कुछ खोये हुए.....
              कितना कुछ संजोये हुए

दास्तां......

जब तक कि मैं वो दास्तां समेट पाती ....
तुमने कुछ शब्द बहा दिए
कुछ जला दिए
अधूरी कहानियों को सीने वाले शब्द....
  कहीं तो मिलते ही होंगे बाज़ार में

  आज कलम...... कुछ ख़ास बिनेगी

घर.....

सोचती हूँ ....
निकलूँ खुद से
और ....इन शब्दों में घर बना लूँ.....
तुम भी तो वहीँ कहीं रहते हो शायद

😊😊😊😊😊😊😊

जान गयी हूँ ....

जान गयी हूँ ....नाराज़ हो....
मेरे शब्द .....आज जले ही नहीं

सुकून.....

सुकून ढूंढते ढूंढते तुम जरुरत हुए
जरुरत होते होते ...प्यास बन गए
तुम सुकून कहाँ रहे ?
ये इश्क़...... इतना बुलबुला क्यों है ?

तस्वीर यहीं कह रही शायद .... सुनके देखियेगा इक बार

रिश्ता....

जाने कौन सा रिश्ता है ......
जो हर बार तुझसे मिल कर फिर शुरू हो जाता है
हूबहू पहली बार की तरह  .......

अर्ज़ है ....

सुनो ....
आज इस दिल को लपेट कर रख दो
बस इक हंसी रहने दो ......दरमियां
थोड़े लफ्ज़ .....खट्टे मीठे
इक टुकड़ा ....इश्क़
और वो .....वो इक हिस्सा सुकून भी 
इक साज़ ....
इक.... सरकती रात
कुछ मोगरे ....ये रंग पिघलते
इक.... जलता दिया
और रत्ती भर ......तुम
और मैं ....
मैं इन सब में ज़रा ज़रा

अर्ज़ है ....
ख्वाइशों की

महक....

"अमृता" नाम की महक
जिस भी शब्द के पास से गुज़र जायेगी
वहीँ इक "इमरोज़" इश्क़ लिखता नज़र आएगा

कुछ हो न सके ...

कुछ हो न सके ...
इसलिए तो इतना सारा हो गए तुम्हारे लिए

होने की आस और.............................................
................................ ना होने के आभास के बीच

तेवर....

ख्वाइशों का क्या है ....
कभी इक मोगरे की लड़ी में भी सिमट जाती है
कभी उसे तुम भी चाहिए होते हो

Depends ....आज मेरी ख्वाइश का तेवर कैसा हैं ....☺☺☺☺☺☺

बुधवार, 14 सितंबर 2016

इस रात ने ....उस चाँद को

इन खामोशियों को उधेड़ोगे तो मेरे शब्द नज़र आएंगे
और फिर जब इन्ही शब्द को बुनोगे तो मेरी खामोशी

जाल तो मैं शानदार बुन ही देती हूँ ... है ना ?
और तुम फंस भी जाते हो .... है ना ?

इस रात ने ....उस चाँद को
न जाने ये कितनी बार कहा होगा
और
  उस चाँद ने ....इस रात को
  न जाने कितनी बार फिर बुना होगा

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

जब तुम नहीं मिलते ....

जब तुम नहीं मिलते ....
तो खुद में ठिठक कर खड़ी हो जाती हूं ....
यहाँ वहां खो जाने से बेहतर है.......
खुद में रुक जाना

बुधवार, 31 अगस्त 2016

मायावी.....

जब होते हो .....
तब भी कितना कम होते हो मेरे पास
और जब नहीं होते......
तो कितना ज्यादा

तुम भी ...... अपने शब्दों की तरह मायावी हो

सीमा....

इक बात कहूँ...?

मेरे लिए सीमाएं बनाना ......
और फिर....... खुद अपनी तोड़ देना
कोई ......."तुमसे"  सीखे

और ......सीमाएं लांघना....... "सिर्फ मुझसे "

शब्द.....

चीखते नहीं मेरे शब्द
बस .....गुनगुना देते हैं तुम्हें
सच कहा तुमने......" सयाने " हो गए हैं

इंसान और धरा....

इंसान हो.....
सुना है .... रिश्ते निभाने में माहिर हो
फिर मेरे लिये ही क्यों ?
हर रिश्ता समेट कर बैठ जाते हो
सारी अनुभूतियाँ लपेट कर बैठ जाते हो
कितना कुछ पनपा लेने का फख्र हासिल है मुझे
पर खुद के लिए तुमसे इक शून्य ही पनपा पायी हूँ
अपना ही दुःख आज तलक नहीं समझा पायी हूँ

पृथ्वी ....धरा
भूमि.... वत्सला
बस...... नाम ही तो दिया है तुमने मुझे
इस लिए शायद
नाम भर का ही रिश्ता रखते आये हो
भाई होते तो.... संजो के रखते अपने हाथों पर ,
पिता होते तो ......उठाये फिरते अपने काँधों पर ,
माँ होते तो ....उढ़ाते जाते धानि चुनरिया ,
बहन होते हो ....बढ़ाते जाते मेरी उमरिया

जाओ.....
मेरे लिए भी कोई रिश्ता गढ़वा लाओ
ये" देने -लेने"  के अलावा
मेरे लिए भी कोई ख़ास वजह मढ़वा लाओ
सुना है..... तुम इंसान हो
सुना है .....काफी महान हो

समुन्दर....

आज समुन्दर को समुन्दर से गुजरते हुए देखा
जो कोई देख न सके वो मुझ से कहते हुए देखा

रात रानी.....

लो...... चाँद भी बुझा दिया
अपने शब्दों की लौ भी कम कर दी
मुस्कुरा देते तो.... रात रानी खिल जाती

हम....तुम

हम जुदा तो हुए...... फिर हासिल हो गए
तुम खुदा भी हुए ....   क्यों साहिल हो गए

खूबसूरत.....

कौन कहता है ...तुम "खूबसूरत" हो ?

ये तो "शब्द" हैं मेरे .....
जो तुम पर खूब फबते हैं
छूते हैं तुमको ....
और खूब हँसते हैं

प्रारब्ध....

करीब से देखोगी तो .....मुझमें शब्द मिलेंगे
और 
बेहद करीब से प्रारब्ध

कल्पना ने कल्पना से कहा .....☺☺☺☺☺

परछाई.....

वो सारे शब्द .....
जिनमें तुम्हारी परछाई थी ......दूर तक गए
शायद  पहुँच गए
बाकि तो बस थक कर बैठ गए हैं ....
  किसी किताब के किसी मुड़े हुए हर्फ़ पर

ज़ाहिर....

जरूरी नहीं .....कि लिख देने भर से
मैं  "ज़ाहिर " हो जाऊं
ज़ाहिर कर देने वाले मेरे शब्द पारदर्शी हैं ....
सब ही को दिखते हैं
बस गिने चुनों को महसूस होते हैं ....
और ज़ाहिर .......

सफर....

कुछ ख़त ....
अपनी लकीरों में "सफर " ही लिखवा कर लाते  हैं ....
पहचानते हैं अपना मंज़िल ........
पर...
दो कदम पहले रूक कर ........लौट आते हैं
क्योंकि....
वो पहुंचना नहीं .......मंज़िल पाना चाहते हैं

असीम मैं .....अनंत वो

कह देती हूँ अपनी ख्वाइशें इस समुन्दर से
इक वही है जो पलटकर हामी भरता है
असीम मैं .....अनंत वो
Perfect combination
Mutual admiration

शब्द.....

जब शब्द "स्त्री" होते हैं तो .....
कितना कुछ कह जाते हैं ........"पुरुष" को
और
जब कभी "पुरुष" होते हैं तो .......
जाने क्या क्या कह जाते हैं ......."स्त्री" को

शब्दों को शायद कुछ नहीं होना चाहिए ....

जन्मदिन मुबारक अमृता जी ....

शब्दों से इमरोज़ तो बहुत मिल जाते हैं ...

पर अमृता वाला इमरोज़ तो फिर हुआ ही नहीं ....
जैसे इमरोज़ वाली अमृता फिर कभी नहीं हुई ....

जन्मदिन मुबारक अमृता जी ....
इश्क़ मुबारक अमृता जी.....

कल्पना पांडेय

रविवार, 14 अगस्त 2016

तस्वीर.....

तस्वीर नहीं....
मेरा दर्द खींच पाओ .... तो कुछ बात बने

प्रेम.....

आसपास ....
इतने शब्द ......इतनी संवेदनाएं
बिखरी पड़ी हैं कि ......
जिसे उष्मा दो ......वो बोल पड़े....
बस .....
मन का अलाव ......प्रेम से सुलगा होना चाहिए

विकल्प.....

कभी कभी ....
शब्दों को घोल कर.....पी जाना भी
इक बेहतरीन विकल्प हो सकता है .... 

अपने "मैं" को ...यूँ ही .....क्यों जाया करना ?

मैं.....

कुछ तो आकार होता ही होगा इन शब्दों का.......

या तो.....
नुकीले होते होंगे
रूह से लहू रिसाने वाले
अपना "मैं"..... चुभाने वाले

या फिर....

  गोल गोल घिसे हुए
रूह से रूह सहलाने वाले  
मेरा "मैं"...... दिखाने वाले

इनके आकार..... प्रकार से ही तो "मैं " जीवित है
मेरा भी.....
तुम्हारा भी .....

यात्रा

प्रेम सबसे कम समय में तय की हुई सबसे लंबी दूरी है... यात्रा भी मैं ... यात्री भी मैं